अनिवार्य प्रश्न
corona 1

अपनी खुद की खोदी हुई खाई में डूबती दुनिया

(कोविड-19 के संक्रमण काल पर एक विशेष संवेदनात्मक आलेख)


कोविड-19 के संक्रमण काल में जब विश्व आपदा को जी रहा है तब विश्व की शक्तियों व आम आदमी के जीवन में उनके उनके विचारों और अवस्थाओं के अंतर को एक दार्शनिक रिपोर्ताज में टटोल रहे हैं अनिवार्य प्रश्न अखबार के प्रधान संपादक व साहित्यकार छतिश द्विवेदी ‘कुंठित’

अनादर होता रहा है निरंतर प्रत्येक प्राकृतिक मूल्यों का, प्राकृतिक अलंकारों का, सांसारिक संचेतनाओ का भी। सभी करते रहे हैं कुछ ना कुछ अनादर अपने-अपने हिस्से में। खेलते रहे हैं सब इस प्रकृति के साथ। भली प्रकार यह जानते हुए कि इस प्रकृति के बगैर किसी का कोई अस्तित्व नहीं है। यह जरा सा असंतुलित क्या हो जाएगी विश्व की तस्वीर यह की वह हो जाएगी। जिस सौंदर्य पर इस दुनिया को नाज है वह सौंदर्य देखते-देखते देखते अदर्शनीय भयकारी हो जाएगा।

दृष्टि को जरा सूक्ष्म करके देखेंगे और मानवता को सही से टटोलेंगे तो पाएंगे की आम आदमी को ना ही विश्व से मतलब है, ना ही देश से मतलब है, ना ही किसी सामुदायिक अस्तित्व से मतलब है, ना ही किसी सरकार से। वह संपूर्ण सृष्टि की शक्तियां अपने निजता में ले लेना चाहता है। और इसके लिए वह हर अच्छे-बुरे कदम उठा लेता है। व्यक्ति अगर ग्राम पंचायत प्रमुख होता है तो सभी पंचायती शक्तियों को अपने और सिर्फ अपने लिए इस्तेमाल करता है। अगर वह राष्ट्र प्रमुख है तो संपूर्ण राष्ट्रीय शक्तियों का प्रयोग भी संवेदनहीनता से निजी सत्ता के अस्थाई स्थापना में लगाए रहता है। इतना ही नहीं अगर कुछ और आगे समझा जाए तो वह अपनी महत्व कांक्षा में कुछ इस तरह के आयोजनों की संरचना भी करता है जिससे कि पूरे विश्व को हराकर अपनी सत्ता को कायम रख सके। यह कोई दार्शनिक विचार नहीं है इतिहास में इसके अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं। हालांकि हर सत्तासील आदमी सुरक्षात्मक यंत्रों के निर्माण में वजह यही बताता है कि वह राष्ट्र रक्षा और विश्व से अपने समाज की सुरक्षा के लिए यह सब प्रयास कर रहा है। इन्हीं प्रयासों में कहा जा रहा है कि कुछ महत्वपूर्ण समाजों ने कोरोनावायरस जैसे भयानक आपदा को विश्व को उपहार स्वरूप दे दिया है। सत्य क्या है यह तो आने वाले समय में ही खास पर्दा उठने के बाद पता चल पाएगा कि यह स्वाभाविक प्राकृतिक विनाशकारी आपदा है या किसी व्यक्ति या राष्ट्र जनित षणयंत्र है।

अगर आपदा प्रकृति प्रदत्त है तो यह तो मानना ही पड़ेगा कि मनुष्य अपनी भूलों से इसे आमंत्रित किया है। अगर यह मनुष्यों द्वारा लाया गया है तो इसे स्वीकारना पड़ेगा कि प्रकृति आने वाले समय में गढ़ने वाले मनुष्यों को भी माफ नहीं करेगी और ना ही प्रभावित होने वाला अन्य राष्ट्र व अन्य मानव समाज उन रचनाकारों को माफ कर पाएगा।

हालांकि छोटे बड़े हरसमाचार में लाखों लोगों के संक्रमित होने और लाखों लोगों के दिवंगत होने की लगातार सूचना मिल रही है। जो सिर्फ चिंताजनक ही नहीं है हृदय को चीर कर एक दूसरे पर अविश्वास करने और राष्ट्रीय शक्तियों पर अविश्वास करने के अलावा खासकर विनाशकारी शक्तियों को समूल नष्ट कर देने के लिए उत्तेजित कर देने वाली है। विश्व के हालात की सूचना असीम शोक से भर देती है कि ऐसे समाजों में आम आदमी सुरक्षित कैसे रह पाएगा। हम उस आम आदमी की बात कर रहे हैं जिसको राष्ट्रीय शक्ति व उसकी सुरक्षा से कोई मतलब नहीं, जिसको विश्व के तमाम बड़े संगठनों में क्या निर्णय हो रहे हैं उसे कुछ पता नहीं होता और ना ही उस तक बात पहुंचाई जाती है। हम उस आम आदमी की बात कर रहे हैं जो अपने परिवार में, अपने सीमित संबंधों में, अपने कुछ छोटे सपनों के साथ उन्मुक्त जीना चाहता है। ठीक वैसे ही जैसे प्रकृति के और जीव जंतु जीते हैं। जिनका किसी से विरोधाभास नहीं रहता। जिनकी जीवन से अधिक दूसरी कोई महत्वकांक्षा नहीं होती। वह आम आदमी जो जिंदगी को जिंदगी मानकर जीता है। जिंदगी को ना ही यात्रा मानता है और ना ही जिंदगी को किसी दौर या किसी प्रतियोगिता की तरह पहचानता है।…..सोचिए कि ऐसे आम आदमी को जीने के लिए हमारा संपूर्ण समाज कैसा पर्यावरण दे रहा है। इसका चिंतन किया जाए तो सिर्फ दुख ही हाथ आएगा

संपूर्ण सत्ताएं अपनी परिधि बनाती हैं ताकि वह बची रह सकें। इसके दिए जाने वाले कारण चाहे जो हों पर आम आदमी चाहे किसी भाषा का बोलने वाला हो, चाहे किसी क्षेत्र का रहने वाला हो, चाहे किसी विचारधारा का हो, किसी धर्म का हो, किसी जाति का हो या किसी पंथ-संप्रदाय का हो उसकी सबसे बड़ी जरूरत होती है उसकी अपनी व उसके अपनो की जिंदगी। हमारे सामाजिक प्रयोग अगर हमारे जीवन के लिए संकट बन जाएं, हमारा साझा जीवन अगर हमारे व्यक्तिगत जीवन के लिए खतरा बन जाए, और हमारी राष्ट्रीय शक्तियां और उसकी प्रयोगशाला अगर मंगलकारी न होकर अमंगलकारी हो जाएं तो ऐसी विश्व की सूरत की क्या जरूरत है। आम आदमी ईश्वर की सत्ता में जीना चाहता है। जहां प्रेम हो, संपूर्ण भक्ति हो, आदमी की आदमी के प्रति आस्था हो, सहज जीवन हो, सरल कल्पनाएं उन्मुक्त चक्रमण करती हों और कुछ हो ा ना हो पारिवारिक व सामुदायिक साझा जीवन हो।

जो जहां है, जिस दायित्व पर है, सब ने अपने-अपने दायित्व के निर्वाह में कमी किया है। कुछ ने दूसरों के दायित्वों में को छीना झपटी भी किया है। कुछ बाजारवाद से प्रभावित होकर नवीन संकल्प संकल्पनाएं गढ़ी गई हैं। उन्हीं की देन है कि आज बाजार स्थानीय मर्यादा और परिघियों को तोड़कर वैश्विक हो गया है। लोग जो साझा जीवन को एक सीमा तक ही जी पाते थे अब  कहां-कहां आते जाते हैं और एक दूसरे के संपर्क में हैं। संपर्क अच्छा हो तो श्रेष्ठ फलदाई होता है और बुरा हो तो परिणाम आपके सामने हैं। चीन के संपर्क में आकर पूरी दुनिया पछता रही है। हम तेजी से संक्रमित हो रहे हैं। अपनों से ही, अपनों के बीच ही, निश्चित रुप से। हमारे विचार संक्रमित हुए होंगे, कहीं कुछ गलत हुआ जरुर है। अब यह गलती चीन की है या यह गलती उन देशों की है जिन देशों में चीन से आवाजाही है अथवा जिन देशों की आवाजाही चीन में है। पर खता तो हुई है। कोई सीमा लांग दी गई है, लाखों मर गए, कई लाख संक्रमित हैं। भारत में भी कई हजार अपने नहीं रहे, दुख असीम है। उसके रोकने के प्रयास सीमित हैं, देश विपन्न है, सिर्फ युक्तियों के सहारे सफर पर है, भविष्य में भयंकर अधिकार है, कौन बचेगा कौन जाने वाला है, इस दुखद यात्रा में सरकार कह रही है वह तैयार है, सब की सुरक्षा के लिए।

विश्व आपदा के समंदर में कुछ नाव लेकर उतर गया है, जीत जाएगा और किनारे तक जाएगा इस दावे के साथ लहरों से दो-दो हाथ कर रहा है। संपूर्ण मानवता मानवता से ही संकट में धिर गई है। पूरी दुनिया प्रकृति व उसके मूल्यों के खिलाफ खड़ी होकर जिस खाई को खोदी है उसी खाई में डूब रही है। सब विज्ञान की तरफ देख रहे हैं। सरकारों के फैसले रोज नए सुनाई दे रहे रहे हैं। चिकित्सक, पुलिस, समाजसेवी और पत्रकार सराहे जा रहे हैं कि आज अगर वह नहीं होते तो समाज का अस्तित्व कैसा होता। हालांकि ये लोग सर्वकालिक सामाजिक जरूरतों की कड़ियों में आते हंै इसीलिए तो इन्हें ईश्वर का दूसरा स्वरूप कहा गया है। दुनिया आज दुनिया को देख रही है। बस, ठीक उसी तरह जैसे कई लड़खड़ाती नावों के लो एक दूसरी कुछ संभली हुई नाव पर सवार लोगों को देखते हैं। कि कौन कितना नुकसान सह रहा है, कौन कितना लड़का रहा है, कौन कितना लड़ पा रहा है, सबकी जान गले में अटकी हुई है, सब यही सोच रहे हैं कि ईश्वर क्या करने जा रहा है?

आगे से व्यक्ति-व्यक्ति व विश्व की सभी शक्तियां प्रकृति के अनुकूल फैसले लें, सबको सद्बुद्धि मिले, सब अपने-अपने दायित्व का निर्वाह करें, परस्पर प्रेम करते हुए प्रकृति से वफा करें और ईश्वर सबकी रक्षा करें। इसी कामना के साथ आज समूची दुनिया है। अज्ञात के सहारे हिम्मत बांधे हुए।