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गीत


उठो साथियों!
सूर्य प्रकाश मिश्र, वाराणसी

उठो साथियों देश बुलाता।
राष्ट्र गान का अक्षर -अक्षर
शपथ देश की याद दिलाता।
तुम हो अग्नि पुत्र बलिदानी,
शौर्य तुम्हारा अमिट कहानी,
शान्ति छोड़कर क्रांति ओढ़ लो
खौल रहा गंगा का पानी,
सहनशीलता क्रुद्ध हो गई
धैर्य खड़ा आवाज लगाता।
पर्वत राज पुकार रहा है,
सिन्धु आज हुंकार रहा है,
परिवर्तन कर रहा प्रतीक्षा,
स्वाभिमान ललकार रहा है,
रक्त हमेशा मूल्य मांगता
सेनानी हर मूल्य चुकाता।
युद्ध देश हित करना होगा,
घाव हृदय का भरना होगा,
खड़े हुवे यदि युद्ध भूमि में
अपनों से भी लड़ना होगा,
राष्ट्रधर्म अनुयायी का यश
सदियों तक इतिहास सुनाता।


गीत एकाकी मिलन के
राजेन्द्र प्रसाद गुप्त ‘बावरा’, चन्दौली

गीत एकाकी मिलन के
प्रिय तुम्हें कैसे सुनाऊँ।
वेदना की बेकली है,
मोड़ अंधा हर गली है
मौन चैराहे पड़े यह
मूर्छिता कच्ची कली है
जो नहीं आये अधर तक
गीत कैसे गुन गुनाऊँ।
छा उठा पतझार अब है,
लुट रहा श्रृंगार अब है,
देवकी माता के पग में
बेड़ियों का हार अब है,
स्नेह के संचार का प्रिय
राग कैसे भूल जाऊँ।
अपनी सुन्दर सभ्यता है,
फिर भी घेरे दनुजता है,
प्रीति के इस रीति पर अब
चल न पाती वन्धुता है,
बावरा विस्मृत हुई जो
साधना अब कर न पाऊँ।


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