अनिवार्य प्रश्न
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संगीत और भारत

अनिवार्य प्रश्न । मंचदूत टीम

संगीत भारत की आत्मा में बसा है। वेदों में रक्षित ओम से जन्मा और भारत में युगनुसार पलता,फलता, फूलता रहा। इस अंक में संगीत पर अनिवार्य प्रश्न की विशेष प्रस्तुति-

संगीत एक  परिचय

भारतीय संगीत को भारतीय संगीतकारों ने विविध रूप से परिभाषित किया है। ‘संगीत रत्नाकर‘ के अनुसार गीतं वाद्य तथा नृत्य त्रयं संगीतमुच्यते-अर्थात् गीत, वाद्य और नृत्य-इन तीनों का समुच्चय ही संगीत है। परन्तु भारतीय संगीत का अध्ययन करने पर यह आभास होता है कि इन तीनों में गीत की ही प्रधानता रही है। वाद्य और नृत्य गीत के अनुगामी रहे हैं। एक अन्य परिभाषा के अनुसार, सम्यक् प्रकारेण यद् गीयते तत्संगीतम्-अर्थात् सम्यक् प्रकार से जिसे गाया जा सके वही संगीत है। अन्य शब्दों में स्वर, ताल, शुद्ध, आचरण, हाव-भाव और शुद्ध मुद्रा के गेय विषय ही संगीत है। वास्तव में स्वर और लय ही संगीत का अर्थात् गीत, वाद्य और नृत्य का आधार है।

सही परिभाषा

संगीत एक ललित कला है। जिसमें स्वर और लय के द्वारा हम अपने भावों को प्रकट करते हैं। ललित कला के वर्ग में कुल पाॅच कलाएँ आती हैं। संगीत, कविता, चित्रकला, मूर्तिकला और वास्तुकला में मनुष्य भावनाओं को व्यक्त तो करते हैं, परन्तु प्रत्येक में उसका माध्यम बदला करता है। अगर रंग, पैन्सिल, कागज आदि के द्वारा भावों को व्यक्त करते हैं तो वह चित्रकला होती है। इसी प्रकार यदि स्वर-लय के द्वारा अपने भावों को प्रकट करते हैं तो संगीत की रचना होती है।

लोक मान्यताएं

ललित कलाओं में संगीत को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। इस प्रकार संगीत समस्त कलाओं में सर्वश्रेष्ठ है। संगीत का सम्बन्ध देवी-देवताओं से भी जोड़ा गया है। एक किंवदन्ती है कि सर्वप्रथम ब्रह्मा ने मां सरस्वती को और सरस्वती ने नारद को संगीत की शिक्षा दी। इसके बाद नारद ने भरत को संगीत सिखाया और भरत ने नाट्यशास्त्र द्वारा जन साधारण में संगीत का प्रसार किया। संगीत की उत्पत्ति में इस प्रकार की प्रमुख रुप से सात किंवदन्तियाँ प्रसिद्ध हैं। प्राचीन काल में इन किवंदन्तियों का महत्व शायद रहा भी हो, किन्तु आज के वैज्ञानिक युग में इनका विशेष महत्व नहीं रह गया है।

शब्द परिचय

‘गीत‘ शब्द में ‘सम्‘ उपसर्ग लगाकर ‘संगीत‘ शब्द बना है। ‘सम्‘ यानी ‘सहित‘ और ‘गीत‘ यानी ‘गान‘। ‘गान सहित‘ अर्थात् अंगभूत क्रियाओं (नृत्य) व वादन के साथ किया हुआ कार्य ‘संगीत‘ कहलाता है।

हमारा भारतीय संगीत

प्राचीन काल में हमारे भारतीय संगीत के दो रूप प्रचलित हुए-1. मार्गी तथा 2. देशी। कालांतर में मार्गी संगीत लुप्त होता गया। साथ ही देशी संगीत दो रूपों में विकसित हुआ- शास्त्रीय संगीत तथा लोक संगीत। शास्त्रीय संगीत शास्त्रों पर आधारित है तथा विद्वानों व कलाकरों के अध्ययन व साधना का प्रतिफल है। यह अत्यंत नियमबद्ध तथा श्रेष्ठ संगीत है। लोक संगीत काल और स्थान के अनुरूप प्रकृति के स्वच्छन्द वातावरण में स्वाभाविक रूप से पलता हुआ विकसित होता रहा, अतः यह अधिक विविधतापूर्ण तथा हल्का-फुल्का होते हुए भी चित्ताकर्षक है।

संगीत का जन्म

भारतीय संगीत की उत्पत्ति वेदों से मानी जाती है। वेदों का मूल मंत्र है – ‘ओम‘ (ओऽम्) । (ओऽम्) शब्द में तीन अक्षर अ, उ तथा म् मिले हैं, जो क्रमशः ब्रह्मा अर्थात् सृष्टिकर्ता, विष्णु अर्थात् जगत् पालक और महेश अर्थात् संहारक की शक्तियों के द्योतक हैं। इन तीनों अक्षरों को ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेद से लिया गया है। संगीत के सात स्वर षड़ज (सा), ऋषभ (र), गांधार (गा) आदि वास्तव में ‘ओम‘ (ओऽम्) या ओंकार के ही अन्तर्नाद हैं। साथ ही स्वर तथा शब्द की उत्पत्ति भी ‘ओम‘ के गर्भ से ही हुई है। मुख से उच्चारित शब्द ही संगीत में नाद का रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार ‘ओम‘ को ही संगीत का जनक माना जाता है। इसीलिए कहा जाता है कि जो साधक ‘ओम‘ की साधना करने में समर्थ होता है, वही संगीत को यथार्थ रूप में ग्रहण कर सकता है। यदि दार्शनिक दृष्टि से इसका गूढ़ार्थ निकाला जाय, तो इसका तात्पर्य यही है कि ‘ओम‘ अर्थात् सम्पूर्ण सृष्टि का एक अंश हमारी आत्मा में निहित है और संगीत उसी आत्मा की आवाज है, अतः संगीत की उत्पत्ति हृदयगत भावों में ही मानी जाती है।

संगीत का स्वरूप

प्रत्येक कला के मुख्य दो रूप होते हैं-क्रिया और शास्त्र। क्रिया के अंतर्गत उसकी साधना विधि और शास्त्र के अंतर्गत उसका इतिहास व परिभाषिक शब्दों की व्याख्या आदि आती है। संगीत के भी दो रूप हैं-
क्रियात्मक स्वरूप: संगीत का क्रियात्मक रूप वह है, जिसे हम कानों द्वारा सुनते हैं अथवा नेत्रों द्वारा देखते हैं। दूसरे शब्दों में क्रियात्मक संगीत में गाना, बजाना और नाचना आता है।  संगीत का यह पक्ष बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। शास्त्रीय पक्षः शास्त्र पक्ष में संगीत सम्बन्धी विषयों का अध्ययन करते हैं। इसके दो प्रकार हैंः क्रियात्मक शास्त्र और शुद्ध शास्त्र।

संगीत की शैलियां

भारतवर्ष में मुख्य रूप से दो प्रकार का संगीत प्रचार में है, जिसे संगीत की पद्धति कहते हैं। उनके नाम हैं उत्तरी अथवा हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति और दक्षिणी अथवा कर्नाटक संगीत पद्धति। उत्तरी संगीत पद्धति उत्तरी हिन्दुस्तान में बंगाल, बिहार, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, गुजरात, जम्मू-कश्मीर तथा महाराष्ट्र प्रान्तों में प्रचलित है।
दक्षिणी संगीत पद्धति को कर्नाटक संगीत पद्धति भी कहते हैं। यह तमिलनाडु, मैसूर, आंध्र प्रदेश आदि दक्षिण के प्रदेशों में प्रचलित है। ये दोनों पद्धतियाँ अलग होते हुए भी इनमें बहुत कुछ समानताएं हैं।

प्रकार

भारतीय संगीत के मुख्य दो प्रकार हैं शास्त्रीय संगीत और भाव संगीत। शास्त्रीय संगीत उसे कहते हैं, जिसमें नियमित शास्त्र होता है और जिसमें कुछ विशिष्ट (खघस) नियमों का पालन करना आवश्यक होता है। उदाहरणार्थ, शास्त्रीय संगीत में राग के नियमों का पालन करना पड़ता है, न करने से राग हानि होती है। भाव संगीत में शास्त्रीय संगीत के समान न कोई बन्धन होता है और न उसका नियमित शास्त्र ही होता है। भाव संगीत का मुख्य और एकमात्र उद्देश्य कानों को अच्छा लगना है, अतः उसमें कोई बन्धन नहीं रहता। भाव संगीत को मुख्य तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-चित्रपट संगीत। लोक संगीत। भजन-गीत।

संगीत के विविध अंग

संगीत से सम्बंधित कुछ मूलभूत तथ्यों को जानकर ही संगीत की बारीकियों को समझा जा सकता है। ध्वनि, स्वर, लय, ताल आदि इसके अन्तर्गत आते हैं।

स्वर: ध्वनियों में हम प्रायः दो भेद रखते हैं, जिनमें से एक को ‘स्वर‘ और दूसरे को ‘कोलाहल‘ या ‘रव‘ कहते हैं। कुछ लोग बातचीत की ध्वनि को भी एक भेद मानते हैं। साधारणतः जब कोई ध्वनि नियमित और आवर्त-कम्पनों से मिलकर उत्पन्न होती है, तो उसे ‘स्वर‘ कहते हैं। संक्षेप में यह समझिए की नियमित आन्दोलन संख्यावली ध्वनि ‘स्वर‘ कहलाती है। यही ध्वनि  संगीत की भाषा में ‘नाद‘ कहलाती हैं। इस आधार पर संगीतोपयोगी नाद ‘स्वर‘ कहलाता है।

शुद्ध स्वर: शुद्ध तीव्र स्वर इन्हें विकृत स्वर भी कहा जाता है। सप्तक: सा रेे, ग, म, प, ध, नी, सा, ठाट: सप्तक के 12 स्वरों में से 7 क्रमानुसार मुख्य स्वरों के उस समुदाय को ठाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते है। स्वरसप्तक, मेल, थाट, अथवा ठाट एक ही अर्थवाचक हैं। स्वरों के उस समूह को मेल या ठाट कहते हैं, जिसमें राग उत्पन्न करने की शक्ति हो। राग: कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वरों की सुन्दर रचना जो कानों को अच्छी लगे राग कहलाता है। आजकल राग-गायन ही प्रचार में है। स्वर और वर्ण से अलंकृत ध्वनि, जो मनुष्यों का मनोरंजन करे, राग कहलाता है।

बनारस और संगीत

संगीत का बनारस से बहुत ही गहरा सम्बन्ध रहा है। यहां के घराने पूरे विश्व मे प्रसिद्ध हैं। यहां के ख्याति प्राप्त संगीतकार विश्व पटल पर अपनी छाप छोड़े हंै। बात अगर शहनाई की हो तो विस्मिल्ला खां साहब, तबला की हो तो गुदई महाराज, किसन महराज व गायिकी की हो तो गिरिजा देवी बरबस ही लोगों का ध्यान आकर्षित करती हैं।


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