अनिवार्य प्रश्न

सुशांत, आखिर क्यों, सुशांत? -सलिल सरोज


समाज में किसी भी एक व्यक्ति के द्वारा की गई आत्महत्या को पूरे समाज की सामूहिक असफलता माकर अनेक अनिवार्य प्रश्न खड़े कर रहे हैं वरिष्ठ लेखक सलिल सरोज


आत्महत्या निस्संदेह में एक जघन्य पाप है। एक आदमी जो खुद को मारता है, उसे इस दुनिया में बार-बार लौटना होगा और उसकी पीड़ा भुगतनी होगी।
-श्री रामकृष्ण परमहंस

दुर्खीम द्वारा प्रतिपादित पुस्तक Le suicide (The suicide) सन् 1897 में प्रकाशित हुइर्, जिसमें आत्महत्या के सिद्धांत के बारे में उल्लेख मिलता है। इस पुस्तक में सर्वप्रथम आत्महत्या के अर्थ को समझाया गया है। सामान्य रूप से पूर्व में यह समझा जाता है कि व्यक्ति के स्वयं के प्रयत्नों द्वारा घटित मृत्यु ही आत्महत्या है, लेकिन दुर्खीम इस सामान्य अर्थ को अस्वीकार करते हैं और कहते हैं कि हम आत्महत्या को एक ऐसी मृत्यु की संज्ञा दे सकते हैं, जो कि किसी विशेष उद्देश्य के लिए घटित हुई हो। लेकिन ऐसा कहने में हमारे समक्ष सबसे बड़ी समस्या यह है कि आत्महत्या करने के पश्चात आत्महत्या करने वाले के उद्देश्य के विषय में जानकारी किस प्रकार प्राप्त की जाए। इन्हीं तथ्यों के ध्यानान्तर्गत दुर्खीम ने आत्महत्या को समाजशास्त्रीय प्रारूप में इस प्रकार परिभाषित किया कि ‘‘आत्महत्या शब्द का प्रयोग उन सभी मृत्युओं के लिए किया जाता है जो कि स्वयंमृत व्यक्ति के किसी सकारात्मक या नकारात्मक ऐसे कार्य के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परिणाम होते हैं जिनके बारे में वह व्यक्ति जानता है कि वह कार्य इसी परिणाम अर्थात मृत्यु को उत्पन्न करेगा। अतः उपर्युक्त उल्लेखित पुस्तक में दुर्खीम ने बहुत से आंकड़ों के आधार पर यह स्पष्ट किया कि आत्महत्या किसी व्यक्तिगतकारण का परिणाम नहीं होती अपितु यह एक सामाजिक तथ्य है। जो कि सामाजिक क्रियाओं का परिणाम है। अनेक विद्वानों का मत है कि आत्महत्या की घटना पागलपन तथा एकोन्माद से घनिष्ठतः संबंधित है। कुछ विद्वान आत्महत्या के सम्बन्ध में प्रजाति और वंशानुक्रमण को प्रमुख मानते हैं। उसी प्रकार कुछ भौगोलिकवादियों का मत है कि आत्महत्याएं भौगोलिक परिस्थितियों जैसे तापमान, मौसम व जलवायु आदि से प्रभावित होती है, जबकि कुछ विद्वान निर्धनता, निराशा व मद्यपान आदि के आधार पर आत्महत्या जैसी घटना की व्याख्या करने का प्रयास करते हैं। लेकिन दुर्खीम इन सभी विद्वानों के विचारों से सहमत नही हैं। वे कहते हैं कि आत्महत्या की सामान्य वस्तुनिष्ठ व्याख्या इन आधारों पर संभव नहीं है। क्योंकि ये आधार वैयक्तिक हैं। आत्महत्या की प्रकृति सामाजिक है। इसलिए इसकी व्याख्या समाजसंदर्भ में होनी चाहिए। वास्तविकता तो यह है कि आत्महत्या का सम्बन्ध कुछ विषेश सामाजिक दशाओं एवं उनसे किए गये वैयक्तिक अनुकूलन की मात्रा से होता है। स्वयं दुर्खीम के अनुसार ‘‘आत्महत्या का सामाजिक पर्यावरण की विभिन्न दशाओं के बीच का सम्बन्ध उतना ही अधिक प्रत्यक्ष और स्पष्ट होता है जितना कि जैविकीय और भौतिक दशाएँ आत्महत्या के साथ एक अनिश्चित और अस्पष्ट सम्बन्ध को स्पष्ट करती है।’’ अतः इस कथन के आधार पर स्पष्ट है कि एक सन्तुलित व्यक्तित्व के लिए यह आवश्यक होता है कि सामाजिक दशाओं तथा सामूहिक चेतना का व्यक्ति के जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव स्वस्थ हो, लेकिन जब इसके सापेक्ष व्यक्ति के जीवन पर समूह के नियन्त्रण में आवश्यकता से अधिक वृद्धि अथवा कमी होने लगती है तब सामाजिक दशाएं व्यक्ति को अस्वस्थ रूप से प्रभावित करना आरम्भ कर देती हैं। यही दशाएं आत्महत्या का कारण बनती हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने ऊपर विशेष शक्ति की मात्रा लिए हुये एक सामूहिक व सामाजिक शक्ति का दबाव अनुभव करता है। जिसके परिणामस्वरूप वह आत्महत्या की ओर बाध्य होता है। आत्महत्या करने वाले के कार्य जो कि पूर्व में केवल उसके वैयक्तिक स्वभाव को व्यक्त करते प्रतीत होते हैं, वास्वविक रूप में एक सामाजिक अवस्था के पूरक और विस्तारक होते हैं, जिनकी अभ्यिव्यक्ति आत्महत्या के परिणाम में परिणित होती हैं। इसलिए वास्तविक तथ्यों के अनुसार प्रत्येक मानव समाज में कम या अधिकरूप में आत्महत्या की प्रवृति पाई जाती है। प्रत्येक सामाजिक समूह में आत्महत्या के लिए अपने अनुसार एक सामूहिक प्रवृित्त पाई जाती है, जो कि वैयक्तिक प्रवृतियों को उत्पन्न करती है, न कि वैयक्तिक प्रवृतियों का परिणाम होती है। सम्पूर्ण सामाजिक समूह की ये प्रवृतियां व्यक्तियों को प्रभावित करके आत्महत्या का प्रमुख कारण बनती है। वे तो केवल ऐसे प्रभाव मात्र हैं जिनको आत्महत्या करने वाले व्यक्ति की नैतिक प्रवृति से लिया गया है। जो कि समाज की नैतिक स्थिति की एक प्रति-ध्वनि हैं। व्यक्ति जीवन में अपनी उदासीनता को समझाने के लिए अपने चारों ओर की तात्कालिक परिस्थितियों को दोषी ठहराता है, कि उसका जीवन दुखी है क्योंकि वह दुखी है। लेकिन वास्तविकता में वह बाहरी परिस्थितियों के कारण दुखी है। अपितु ये सभी बाहरी परिस्थितियां उसके जीवन की इधर-उधर की घटना नहीं, बल्कि वही समूह की हैं जिसका कि वह सदस्य है। यही कारण है कि ऐसी कोई सामाजिक परिस्थिति नहीं होती जो कि आत्महत्या के लिए अवसर का काम न कर सके। यह सब तो इस बात पर निर्भर करता है कि आत्महत्या की प्रवृति को उत्पन्न करने वाले कारण कितनी तीव्रता से व्यक्ति को प्रभावित करते हैं।

फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या ने पूरे देश को झकझोड़ कर रख दिया है। एक सफल और उम्दा अभिनेता, युवाओं का आदर्श, बेहतरीन उपलब्धियों का शानदार अतीत और सफलता की पग-पग इबारतें लिखता कैरियर-इतना कुछ होने के बावजूद, क्या खला, क्या नाकामी रह जाती है इंसानी जिंदगी में यह बहुत ही बड़ा प्रश्न बन कर उमड़ पड़ा है। साधनों के अभाव, असहाय होने की असीम पीड़ा, एकाकीपन और बुढ़ापे की चरमराती सहारे की लकड़ी के चलते की गई किसी की आत्महत्या को समझा जा सकता है, लेकिन किसी भी आत्महत्या को सही नहीं ठहराया जा सकता है। सुशांत जैसा बेहद ही सफल अभिनेता और वो भी मात्र 34 साल की उम्र में आत्महत्या कर ले तो समाज के सामने निश्चित ही कई कठिन प्रश्न खड़े हो उठते हैं जिसका जवाब ढूँढने की नितांत आवश्यकता है। हालाँकि यह पहली दफा नहीं है कि किसी अभिनेता ने आत्महत्या की है। इससे पहले गुरुदत्त अक्तूबर 1964 में मुंबई के पेड्डर रोड इलाके में स्थित अपने अपार्टमेंट में मृत पाए गए थे। मनमोहन देसाई की मार्च 1994 में गिरगांव स्थित उनके घर पर ही उनकी मौत हो गई थी। इसके अलावे दिव्या भारती, सिल्क स्मिता, रीम कपाड़िया, नफीसा जोसेफ, कुलदीप रंधावा, जिया खान, प्रत्युषा बनर्जी, कुशल पंजाबी जैसे फिल्म जगत से जुड़े हुए कई लोगों ने अपनी जिंदगी आत्महत्या करके खत्म की है।

मानसिक अवसाद कहीं न कहीं इन सब आत्महत्याओं के पीछे एक बड़ी वजह बन कर उभरा है। इसकी सबसे बड़ी मिशाल है-परबीन बॉबी। परवीन के मन में ये डर बैठ गया था कि कोई उन्हें मारना चाहता है। कुछ समय बाद तो परवीन को लगने लगा था कि उनकी कार में बम रखा है, वो एसी की आवाज तक से डर जाती थीं। परवीन की ऐसी स्थिति देखकर उन्हें कमरे में ही बंद रखा जाने लगा। उन्हें मीडिया और पब्लिक की नजरों से दूर रखना पड़ा। इस दौरान परवीन का वजन काफी बढ़ गया था और उन्होंने अपनी खूबसूरती खो दी थी। तब डॉक्टरों के पास उन्हें इलेक्ट्रिक शॉक देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। अब तक परवीन की हालत बेहद नाजुक हो चुकी थी। उन्होंने दवाइयां खाना बंद कर दिया था। कुल मिलाकर देखा जाए तो ग्लेेमर की जिंदगी जीने वाली परवीन का आखिरी वक्त अंधेरे, तन्हाई और अवसाद में गुजरा।

सामान्यतः आत्महत्याएँ असामान्य आवेग से प्रभावित लगती हैं। इस आवेग की ऊर्जा का अचानक विस्फोट हो सकता है या वह धीरे-धीरे विकसित हो सकती हैं। यह आावेग इस आधार पर तर्कसंगत भी लग सकता है कि आत्मरक्षण की बुनियादी सहजवृत्ति का प्रतिकार करने के लिए इस तरह का बल हमेशा चाहिए। इसके अलावा आत्महत्या के कृत्य को छोड़कर आत्महंतक बिलकुल दूसरे आदमियों जैसे होते हैं। उन्हें सामान्य रूप में उन्मादी नहीं कहा जा सकता। इस तर्क के आधार पर आत्महत्या को एकोन्माद की संज्ञा देकर विक्षिप्तता की अभिव्यक्ति माना गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने हाल ही में दुनियाभर में होने वाली आत्महत्याओं को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है, जिसके मुताबिक दुनिया के तमाम देशों में हर साल लगभग आठ लाख लोग आत्महत्या करते हैं, जिनमें से लगभग 21 फीसदी आत्महत्याएँ भारत में होती हैं। यानी दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा। डब्ल्यूएचओ के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2012 में भारत में 258075 लोगों ने आत्महत्या की थी। हैरत की बात यह है कि इनमें 1.58 लाख से अधिक पुरुष और एक लाख के करीब महिलाएं थीं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉड्‌र्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के तुलनात्मक आंकड़े भी बताते हैं कि भारत में आत्महत्या की दर विश्व की आत्महत्या दर के मुकाबले में बढ़ी है। आज भारत मे 37.8 फीसद आत्महत्या करने वाले लोग 30 वर्ष से भी कम उम्र के हैं। दूसरी ओर 44 वर्ष तक के लोगों में आत्महत्या की दर 71 फीसद तक बढ़ी है। ऐसा नहीं है कि लोग आत्महत्या सिर्फ आर्थिक परेशानियों के चलते ही करते हों, अन्य सामाजिक कारणों से भी लोग अपनी जान दे देते हैं। दरअसल, आज इंसान के चारों तरफ भीड़ तो बहुत बढ़ गई है लेकिन इस भीड़ में व्यक्ति बिल्कुल अकेला खड़ा है। परिवार, मित्र, संगी-साथी तथा स्कूल जैसी ताकतवर संस्थाएं तक आत्महत्या के निवारण मे खुद को असहाय महसूस कर रही हैं। यही कारण है कि आज बच्चों, नौजवानों, छात्रों, नवविवाहित दुल्हनों तथा किसानों की आत्महत्याएं सामाजिक संवेदनाओं का हिस्सा नहीं बन पा रही हैं। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक यह भी एक चैंकाने वाला तथ्य है कि भारत में आत्महत्या करने वालों में बड़ी तादाद तादाद 15 से 29 साल की उम्र के लोगों की है, यानी जो उम्र उत्साह से लबरेज होने और सपने देखने की होती है उसी उम्र में लोग जीवन से पलायन कर जाते हैं। इस भयानक वास्तविकता की एक बड़ी वजह यह है कि पिछले कुछ दशकों में लोगों की उम्मीदें और अपेक्षाएं तेजी से बढ़ी हैं, लेकिन उसके बरअक्स अवसर उतने नहीं बढ़े। दरअसल, उम्मीदों और यथार्थ के बीच बड़ा फर्क होता है। यही फर्क अक्सर आदमी को घोर अवसाद और निराशा की ओर ले जाता है। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि देश के आईआईटी व आईआईएम जैसे तकनीकी व प्रबंधन के उच्च शिक्षण संस्थानों तक में छात्रो के बीच आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। यह स्थिति हमारी शासन व्यवस्था के साथ-साथ हमारी समाज व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है और हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर परस्पर प्रेम, स्नेह, संवाद पर आधारित हमारे पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों, आदर्शों और नैतिकता का हमारे जीवन से क्रमशः लोप क्यों होता जा रहा है? आमतौर पर बच्चों, युवाओं, महिलाओं और किसानों के बीच बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं के लिए परीक्षाओं का तनाव व दबाव, प्रेम में नाकामी, दहेज-लोलुपता, गरीबी, बेरोजगारी, नशे की लत जैसे कारकों को जिम्मेदार माना जाता है। लेकिन ऐसी दशाएं तो कमोबेश प्रत्येक देश-काल में मौजूद रही हैं। परंतु पहले लोग इतनी बड़ी तादाद में और इतनी जल्दी जीवन से हार मानकर मौत को गले नहीं लगाते थे।

एक अध्ययन के मुताबिक 2017 में प्रत्येक सात में से एक भारतीय अलग-अलग तरह के मानसिक विकारों से पीड़ित रहा, जिसमें अवसाद और व्यग्रता से लोग सबसे ज्यादा परेशान रहे। मानसिक विकार के कारण बीमारियों के बढ़ते बोझ और 1990 से भारत के प्रत्येक राज्य में उनके चलन के पहले व्यापक अनुमान में दर्शाया गया है कि बीमारियों के कुल बोझ में मानसिक विकारों का योगदान 1990 से 2017 के बीच दोगुना हो गया। दरअसल, आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति विशुद्ध रूप से एक समाजशास्त्रीय परिघटना है। आज व्यक्ति अपने जीवन की तल्ख सच्चाइयों से मुंह चुरा रहा है और अपने को हताशा और असंतोष से भर रहा है। आत्महत्या का समाजशास्त्र बताता है कि व्यक्ति में हताशा की शुरुआत तनाव से होती है जो उसे खुदकुशी तक ले जाती है। यह हैरान करने वाली बात है कि भारत जैसे धार्मिक और आध्यात्मिक रुझान वाले देश में कुल आबादी के लगभग एक तिहाई लोग गंभीर रूप से हताशा की स्थिति में जी रहे हैं लेकिन डब्ल्यूएचओ का अध्ययन तो यही हकीकत बयान करता है। कुछ दिनों पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि देश के लगभग साढ़े छह करोड़ मानसिक रोगियों में से 20 फीसदी लोग अवसाद के शिकार हैं। इन मानसिक विकारों में अवसाद, व्यग्रता, शिजोफ्रेनिया, बाइपोलर विकार, विकास संबंधी अज्ञात बौद्धिक विकृति, आचरण संबंधी विकार और ऑटिज्म शामिल है. यह अध्ययन ‘इंडिया स्टेट लेवल डिजीज बर्डन इनिशिएटिव’ द्वारा किया गया जो ‘लांसेट साइकैट्री’ में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन के परिणामों के मुताबिक 2017 में 19.7 करोड़ भारतीय मानसिक विकार से ग्रस्त थे, जिनमें से 4.6 करोड़ लोगों को अवसाद था और 4.5 लाख लोग व्यग्रता के विकार से ग्रस्त थे। अवसाद और व्यग्रता सबसे आम मानसिक विकार हैं और उनका प्रसार भारत में बढ़ता जा रहा है साथ ही दक्षिणी राज्यों तथा महिलाओं में इसकी दर ज्यादा है। अध्ययन में कहा गया कि अधेड़ लोग अवसाद से ज्यादा पीड़ित हैं जो भारत में बुढ़ापे की तरफ बढ़ती आबादी को लेकर चिंता को दिखाती है. साथ ही इसमें कहा गया कि अवसाद का संबंध भारत में आत्महत्या के कारण होने वाली मौतों से भी है। कुल बीमारियों के बोझ में मानसिक विकारों का योगदान 1990 से 2017 के बीच दोगुना हो गया जो इस बढ़ते बोझ को नियंत्रित करने की प्रभावी रणनीति को लागू करने की जरूरत की तरफ इशारा करता है। एम्स के एक प्रोफेसर एवं मुख्य शोधकर्ता राजेश सागर ने कहा है कि “इस बोझ को कम करने के लिए और मानसिक स्वास्थ्य को सामने लाने के लिए सभी साझेदारों के साथ हर स्तर पर काम करने का वक्त है। इस अध्ययन में सामने आई सबसे दिलचस्प बात बाल्यावस्था में मानसिक विकारों के बोझ में सुधार की धीमी गति और देश के कम विकसित राज्यों में आचरण संबंधी विकार है जिसकी ठीक से जांच-पड़ताल किए जाने की जरूरत है।”

एक और प्रश्न जो बहुत ही मजबूती के साथ उठ कर खड़ा हुआ है वह है कि किसकी आत्महत्या को कितनी तवज्जो दी जाए। यदि कोई फिल्मी अभिनेता आत्महत्या करता है तो पूरा देश शोक मनाने लगता है। उनके चाहने वाले बारिश में भी उनके अंतिम दर्शन को निकल पड़ते हैं चाहे कोरोना हो या ना हो। देश का पूरा मीडिया समाज दिन भर किसी के मौत को इस तरह चलाता है जैसे देश में कोई क्रांति हुई हो, जिसकी सुगबुगाहट देशवाशियों को हर घडी मिलती रहनी चाहिए। जीवन और मौत को भी इन्होंने टी आर पी का खेल बना कर रख दिया है। और निजता के अधिकार का माखौल। लेकिन इतना ही शोर शराबा अपने चैनल के ऑफिस में बुलाकर कोई समाचार चैनेल तब क्यों नहीं करता जब कोई आम छात्र, किसान, जवान, कोई पेंशन न मिलने से परेशान वृद्ध, अनाज की कमी से बच्चे और माएँ आत्महत्या कर लेती हैं? क्या एक ‘सेलिब्रिटी’ की आत्महत्या बाकियों की आत्महत्या पर भारी पड़ जाती है कि बाकियों के आत्महत्या की खबर को अखबारों के किसी कोने में दबा दी जाती है। देश में हर महीने 948 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ने  रिपोर्ट में कहा है कि 2016 में देशभर में 11,379 किसानों ने आत्महत्या की थी। इनमें 6,270 किसान और 5,109 खेतिहर मजदूर शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक हर महीने 948 यानी रोजाना औसतन 31 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। किसानों की आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र पहले स्थान पर है। साल 2016 में इस राज्य में सर्वाधिक 3661 किसानों ने आत्महत्या की। इससे पहले 2014 में यहां 4,004 और 2015 में 4291 किसानों ने आत्महत्या की थी। महाराष्ट्र में 2013 से लेकर 2018 के बीच 15,000 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है। लेकिन कितने मीडिया हाउस इस सब के मौत के प्रति उतने ही आक्रामक हैं जितने ये किसी प्रसिद्ध हस्ती की मौत को ले कर हो उठते हैं?

आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं को रोकना एक आदर्श एवं संतुलित समाज का आधार होना चाहिए। विश्व स्तर पर आयोजित होने वाले विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस की सार्थकता तभी है जब इस दिशा में कुछ ठोस उपक्रम हो। संपर्क, संवाद और देखभाल-यह तीन शब्द आत्महत्या की रोकथाम में मूल मंत्र साबित हो सकते हैं। आत्महत्या के पीछे मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक, व्यक्तिगत, सांस्कृतिक एवं परिस्थितिकीय कारण होते हैं। उन कारणों को खोजना जरूरी है। आत्महत्या की घटनाओं को विचारों पर नियंत्रण पा कर, नियमित व्यायाम एवं योगा कर के, स्वयं को उपहार दे कर, दैनिक कार्यों को सूचीबद्ध कर, हॉबी से क्रिएटिव साबित हो कर तथा बेहतरीन को शांतप्रिय संगीत सुन कर जीवन के एकाकीपन को बाँटा जा सकता है और आत्महत्या जैसी क्रूर घटनाओं पर विराम लगाया जा सकता है।

आत्महत्या, किसी के भी जीवन का कभी भी आखिरी फैसला नहीं हो सकता। जीवन का आखिरी फैसला है अंतिम साँस तक डट कर इसको जीना। क्योंकि यह जिंदगी हमें भगवान् से एक उपहार के रूप में मिली है जिसे किसी भी हाल में बर्बाद करना न केवल अपने साथ अन्याय है बल्कि उन सबों के साथ भी अन्याय है जो आपको दिल से चाहते हैं, जो आपके साथ जीना चाहते हैं या जो आपके भरोसे ही जी रहे होते हैं। हालाँकि कई बार परिस्थितियाँ हमारे वश में नहीं होतीं या वैसी नहीं होतीं जिसकी हम अपेक्षा करते हैं लेकिन जिंदगी के दिए हुए ‘बाउंसर’ को हमें ‘डक’ कर देना चाहिए और अच्छी गेंदों का इंतजार करना चाहिए। एक बेहतरीन ‘सेंचुरी’ बनानी चाहिए जिसे जमाना ताउम्र याद रखे। और दूसरों के लिए एक मिशाल पैदा करे। समाज में किसी भी एक व्यक्ति के द्वारा की गई आत्महत्या पूरे समाज की सामूहिक असफलता को दर्शाती है। समाज का हर प्राणी, पशु,पेड़-पौधे सब एक-दूसरे से इस तरह जुड़े हैं कि एक का दर्द दूसरे को जरूर महसूस होना चाहिए। अगर हमारे आस-पास किसी पेड़-पौधे और किसी मूक पशु को तकलीफ है और उससे हमें तकलीफ नहीं है तो जरूर ऐसे समाज में कोई रोग है और उसका उपचार तत्काल होना चाहिए। वरना, यह असंवेदनशीलता एक आदत बन जाती है। और अंततः हम अपने दोस्तों, परिजनों और अपने समाज के लिए एक कोढ़ बन जाते हैं। चाणक्य ने कहा है कि आत्महत्या, कायरों को ही शोभा देती है। आत्महत्या करना एक पाप है और किसी आत्महंता की शवयात्रा में जाना पाप में भागीदार बनना है।

‘उम्मीदों का एक बाग सजाए रखना,
आँखों में कोई गुलाब खिलाए रखना,
जब भी मद्धम पड़ने लगे जीवन की लौ,
अपने जज्बों में कोई जुगनू जलाए रखना’

सलिल सरोज
लेखक भारतीय संसद स्थित लोक सभा के सचिवालय में कार्यकारी अधिकारी हैं।

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