अनिवार्य प्रश्न
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सोशल मीडिया हकीकत या फर्जी

सोशल मीडिया के दुरुपयोग का मुद्दा ऐसा है जिसकी अब अनदेखी नहीं की जा सकती है। ऐसे में इसके खिलाफ कड़े कानून की सख्त जरूरत है।


सोशल मीडिया पर शीघ्र कठोर नियन्त्रण की जरुरत बता रहें हैं अनिवार्य प्रश्न के खेल एवं वाणिज्यिक संपादक कमल चैरसिया


‘‘सवाल यह है कि जिस सोशल मीडिया को जानकारी साझा करने और नवाचार का अहम मंच समझा गया, वह आज लोगों की मौत की वजह क्यों बन रहा है?’’


सोशल मीडिया की भूमिका सामाजिक समरसता को बिगाड़ने और सकारात्मक सोच की जगह समाज को बाँटने वाली सोच को बढ़ावा देने वाली हो गई है। चिंता का विषय है कि मौजूदा वक्त में सोशल मीडिया अपनी आलोचनाओं के लिये चर्चा में रहता है। वाक् एवं अभिव्यक्ति की मौलिक आजादी लोकतंत्र का एक अहम पहलू है। इस अधिकार के उपयोग के लिये सोशल मीडिया ने जो अवसर नागरिकों को दिये हैं, एक दशक पूर्व उनकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी। दरअसल, इस मंच के जरिये समाज में बदलाव की बयार लाई जा सकती है।


सवाल यह है कि जिस सोशल मीडिया को जानकारी साझा करने और नवाचार का अहम मंच समझा गया, वह आज लोगों की मौत की वजह क्यों बन रहा है? सोशल मीडिया आज भारत के लिये चिंता का विषय क्यों बन गया है? एक ऐसे समय में जब देश के कई हिस्सों से धार्मिक सद्भावना बिगड़ने की खबरें आ रही हैं तब सोशल मीडिया एक सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका निभा सकता है। लेकिन, यह चिंता का विषय है कि ऐसा नहीं हो पा रहा।


सोशल मीडिया का दुरुपयोग कई रूपों में किया जा रहा है। इसके जरिये न केवल सामाजिक और धार्मिक उन्माद फैलाया जा रहा है बल्कि, राजनीतिक स्वार्थ के लिये भी गलत जानकारियाँ घर-घर परोसी जा रही हैं। इससे समाज में हिंसा को बढ़ावा तो मिल ही रहा है साथ ही, हमारी सोच को भी नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है।
2017-18 में फेसबुक, ट्विटर समेत कई साइटों पर 2,245 आपत्तिजनक सामग्रियों के मिलने की शिकायत की गई थी। जिनमें से जून, 2018 तक 1,662 सामग्रियाँ हटा दी गईं थी। फेसबुक ने सबसे ज्यादा 956 आपत्तिजनक सामग्रियों को हटाया। इनमें ज्यादातर वे कंटेंट्स थे जो धार्मिक भावनाएँ और राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान का निषेध करने वाले कानूनों का उल्लंघन करते थे। इतनी कम अवधि में बड़ी संख्या में आपत्तिजनक कंटेंट्स का पाया जाना यह बताता है कि सोशल मीडिया का कितना बड़ा दुरुपयोग हो रहा है।
एक अनुमान के मुताबिक, हर 40 मिनट में फेसबुक से संबंधित एक पोस्ट को हटाने की रिपोर्ट की जाती है। दरअसल, अधिकतर व्यक्ति बिना सोचे-समझे ही किसी भी पोस्ट को साझा कर देते हैं। दरअसल, व्हाट्सएप और फेसबुक पर कई सोशल ग्रुप बने होते हैं। अक्सर ये ग्रुप्स किसी विचारधारा से प्रेरित होते हैं या किसी खास मकसद से बनाए जाते हैं। अगर यह कहा जाए कि अधिकतर ग्रुप्स राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित होते हैं तो, गलत नहीं होगा। यहाँ बिना किसी रोक-टोक के धड़ल्ले से फेक न्यूज बनाए और साझा किये जाते हैं। जाहिर है ये न्यूज किसी खास भावना या मकसद से तैयार किये जाते होंगे। फिर यह कहना गलत नहीं होगा कि सामाजिक सौहार्द के सामने सोशल मीडिया एक चुनौती बन कर खड़ा है।


दूसरी तरफ, सोशल मीडिया के जरिये ऐतिहासिक तथ्यों को भी तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। न केवल ऐतिहासिक घटनाओं को अलग रुप में पेश करने की कोशिश हो रही है बल्कि, आजादी के सूत्रधार रहे नेताओं के बारे में भी गलत जानकारियाँ बड़े स्तर पर साझा की जा रही हैं।


एक प्रगतिशील समाज और देश के लिये यह कितना उचित है कि वह आए दिन गलत सूचनाओं को बनाए और साझा करे? यकीनन, यह न केवल हमारी प्रगति की राह में रुकावट है बल्कि, हमारे प्रगतिशील होने के दावों पर भी सवालिया निशान लगाता है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि हमारी सरकारें इसमें दखल दें और इस पर लगाम लगाने की भरसक कोशिश करें।


दरअसल, सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद सोशल मीडिया के जरिये अनैतिक प्रयोग पर लगाम नहीं लग पा रही। इसके लिये भारत सरकार ने साइबर सुरक्षा नीति और सूचना तकनीक कानून भी बनाया है। लेकिन, इस कानून के क्रियान्वयन में दिक्कत आने की वजह से सोशल मीडिया पर अफवाहों को रोकने में कामयाबी नहीं मिल पा रही। लेकिन मौजूदा वक्त में गलत इस्तेमाल की वजहों से सोशल मीडिया ज्यादा चर्चा में रहने लगा है। एक तरफ हमारी सरकार डिजिटल इंडिया जैसे कार्यक्रम लाकर देश की तस्वीर बदलने का प्रयास कर रही है, तो दूसरी तरफ हम इस कार्यक्रम के एक महत्त्वपूर्ण हिस्से का दुरुपयोग कर सरकार और देश को ही चुनौती देने का काम कर रहे हैं। जान-माल की परवाह किये बिना अगर हम मूर्खता की मिसाल इसी तरह कायम करते रहे तो हमें समझना होगा कि समाज और देश को हम पतन के मुहाने पर ले जा रहे हैं। हालाँकि यह सच है कि भारत सोशल मीडिया की वजह से फैल रही नफरतों से संघर्ष कर रहा है। लेकिन यह भी सच है कि भारत में सोशल मीडिया के जरिये कई सकारात्मक पहलों को भी अंजाम दिया गया है।


सोशल मीडिया के दुरुपयोग का मुद्दा ऐसा है जिसकी अब अनदेखी नहीं की जा सकती है। गलत विचारों को साझा करने से देश की आंतरिक सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। ऐसे में इसके खिलाफ कड़े कानून की सख्त जरूरत है।


जरूरी है कि हम देशहित को प्राथमिकता दें और सोशल मीडिया का बेहतर तरीके से प्रयोग कर दुनिया के सामने भारत की बेहतर तस्वीर पेश करें ताकि आने वाली पीढ़ी को हम एक अनुशासित और साफ-सुथरा माहौल मुहैया करा सकें।


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