अनिवार्य प्रश्न
chhatis diwedi

स्वागत् संपादकीय

…तो कलम ही चींख कर रोने लगेगी…
– छतिश द्विवेदी



अगर चुप और मैं बैठा रहा तो, कलम ही चींख कर रोने लगेगी।
सियाही मौन जिस दिन साध लेगी, तबाही बेतरह होने लगेगी।
खबर जब बेलनों के दाब में हो किसी को रोटियाँ देने लगेगी
सियासत फूल के सपने दिखाकर जमीं पर आग ही बोने लगेगी।

क्या हो रहा है हमारी सीमाओं पर? क्या हो रहा है सियासी फैसले में? क्या हो रहा है हमारे विश्व समुदाय में? जो कुछ भी हो रहा है अगर वह मानवता के लिए हितप्रद नहीं है। तो प्रश्न उठता है कि क्यों हो रहा है?

यही कुछ सवाल हैं जो पत्रकार, साहित्यकार, विचारक व दार्शनिक को आम आदमी से कुछ पृथक कर देते हैं। यही अनिवार्य प्रश्न ही उसे आम जन से कुछ कम सहनशील भी बना देते हैं।

मैं भी कई बार अपने आप को अपने दूसरे भारतीय भाई-बहिन से कुछ कम सहनशील व कम दर्द संतोषी पाता हूँ। अपने डेढ़ दशक से अधिक के पत्रकारिता के काल खण्ड में मैंने कलम को व्यसनोद्गार के लिए कभी नहीं छुआ। जब भी कलम उठी सहन व संतोष के टूटने पर उठी। ठीक उस सैनिक की तरह जो बहुत मजबूर होकर ट्रीगर पर अंगुलियों को हरकत का आदेश देता है। जबकि यह उससे अधिक कौन समझ सकता है कि एक गोली में कितना आँशू एवं खून का सागर भरा होता है। लेकिन ऐसा रोज अनेक बार हो और होता रहे तब?

असत्य व अन्यास से जनित विसंगति व वेदनाओं को हमेशा उन्नयन के शीर्ष पर ले जाती रहे तब?
कलम शोले नहीं उगलेंगी? स्याही खून नहीं हो जाएगी? अक्षर अश्रुपूरित नहीं हो जाएँगें? शब्द आह नहीं बन जाएँगें? अथवा भाव चित्कार नहीं हो जाएँगें तो क्या होंगे? मेरे ही तरह देश का मिजाज भी सहन की सीमा से आगे आ गया है। वैसे तो अपने दो चार लालों को आए दिन खोता हमारा देश क्षति को नहीं सह पा रहा है। हर सभा पीड़ाओं की सभा हो गई है। हर राह मोमबत्तियों से रौशन हो गई है। हर यात्री मोमबत्ती व दीप की जगह राष्ट्रनायकों से बन्दूक मांग रहा है। सबको लगता है कि अब यही रास्ता है।

किन्तु मुझ लेखकों की दृष्टि में समाधान थोड़ा कठिन दिख रहा है। एक ओर राष्ट्र जहाँ पाक व उसके साथियों के नापाक मन्सूबों से लड़ रहा है वही दूसरी ओर अपने भीतर भ्रष्टाचार के नापाक सैनिकों से। हमारे बीच में कायम भ्रष्ट भारतीय भी राष्ट्र व उसमें सन्निहित विश्वास की भावना को बड़ा नुकसान पहूँचाए है। ब्रिटिश अनुकरण के साथ उपहार में आया भ्रष्टाचार कितनी क्षति किया है यह तो समझना पड़ेगा परन्तु इसने हमारी सांस्कृतिक शक्ति की बुनियाद पारस्परिक विश्वास व सामाजिक माववीय सद्भाव को मिटा दिया है। अब एक भारतीय दूसरे भारतीय से भय, शक व असुरक्षा अनुभव करता है। देश काल की बाहर व भीतर की स्थिति देखकर समझकर बहुत पीड़ा होती है। आपको भी होनी चाहिए।

अपने क्षेत्र की स्थिति का अवलोकन करें तो शोषण, भ्रष्टाचार, आतंक, अनैतिकता, दबंगई, गुंडई, वसूली, ऐसी ही कई चीजें देश के बाकी क्षेत्रों से यहाँ ज्यादा हैं। क्यों? क्या आपने कभी यह सोचा है? क्योंकि यह आप ही के सोचने की चीज है। इसलिए क्योंकि इन सबके शिकार आप ही होते हैं अथवा आप भी होते हैं। आप सभी की हालत दर्दनाक है। फिर भी, पता नहीं कैसे, आप सभी का खून खौलकर भी नसों में रह लेता है। उसे तो जला देना चाहिए, उन सभी कारकों को जो सामुहिक व सामाजिक जीवन के लिए ठीक नहीं है।
मेरे पास एक सामाजिक संगठन के एक वरिष्ठ नेता आये थे। उन्होंने मुझे बताया कि ‘‘उनके नवजात पोते के लिए दूध की जरुरत थी। वह एक गाय खरीदकर इस समस्या का निवारण चाहते थे। कुछ दूरी पर स्थित एक गाँव की एक गाय पसन्द आ गई। वह नेता जी उस गाय को खरीद कर उसे ट्रैक्टर से लेकर आ रहे थे। बीच राह में एक पुलिस की चैकी पड़ती है। वहाँ के पुलिस वाले उन्हें रोक दिए और आगे जाने से पहले उन्हें देश भर के नियम कानून बताने लगे और बाद में उसी में से एक ने कहा ‘‘अबे, पाँच सौ दे और चलता कर, बात बढ़ाएगा तो जिला जेल जाकर सड़ेगा………आदि।‘‘ नेता महोदय को देना पड़ा। इस प्रकार के लेन-देन को घूस भी नहीं कह सकते, ये तो वर्दीवालों का गुण्डा टैक्स हो सकता है।
जरा सोचिए कि आम आदमी को कितना देना पड़ता होगा और कहाँ-कहाँ। क्या आपको नहीं लगता ऐसी पुलिस चैकियों थानों को जो आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए स्थापित होने के बाद भी उनके शोषण में लिप्त होती हैं, उन्हें आस-पास के सैकड़ों समुदायों द्वारा संगठित होकर आग के हवाले कर देना चाहिए। फूँक देना चाहिए। लेकिन यह गैर कानूनी है। क्या करेंगे, सियासत द्वारा जो नियम कानून सामाजिक हित के लिए बनाए गए हैं वह या तो सही नहीं हैं या  सही से लागू नहीं हैं। हर खास आदमी इसका दुर्पयोग करता है, और हर आम आदमी के लिए ये सभी दंश हैं। अतः दंश का समाधान या निरोध किया जाना चाहिए, क्योंकि करना ही पड़ेगा। विकृतियों से भरते व भ्रष्टाचार से मरते समाज में प्रेम, सद्भाव व सदाचार की स्थापना हेतु तथा आपके सम्पूर्ण हित के लिए मैं निकल पडा़ हूँ, और वर्षाें से मैं सफर में हूँ। अब आपको भी अपने ही लिए इस सत्य के सफर को व नई राह को चुनना होगा। आगे आना होगा, अपनी ड्योढ़ी से निकलना होगा। तभी आपका आँगन सलामत रह पायेगा। नही ंतो अब आपका आँगन या तो कुआँ या सड़क-बाजार बनने जा रहा। क्योंकि विषैली रीतियों व मान्यताओं को लेकर बाजार व उसकी सरकार दोनों आपके दरवाजे पर दस्तक दे चुके हैं। मैं समझने के लिए चैकियों व थानों को उदाहरण में रख रहा हूँ, लेकिन दोष सम्पूर्ण मिशनरी में फैल चुका है। जिन पुलिस थानों-चैकियों व आयुक्त कार्यालयों पर मानवीय मूल्यों की अवहेलना भी होती है, उन पर उनके पुलिस कर्मियों से अधिक पत्रकार आते-जाते व पहुँचते रहते हैं।

 मैं कहना यह भी चाहता हूँ कि इस देश में जितनी प्रशासनिक फौज है उससे कहीं अधिक लेखकों तथा संवाददाताओं की फौज है।

इसके बाद भी सामाजिक दोषपूर्ण कृत्य होते रहने से यह तथ्य ज्ञात होता है कि हमारी पत्रकारिता की फौज में कुछ भटकाव है। हांलाकि इसके सच्चे सेवक भी बहुत हैं। मेरा हमेशा से इन दो बातों में विश्वास रहा है, पहली कि पत्रकार बनाए नहीं जाते, वह पैदा ही होते हैं। दूसरी यह कि एक भ्रष्ट पत्रकार को ईमानदार व्यक्ति बनाना काफी कठिन है, उसकी अपेक्षा एक ईमानदार व्यक्ति को पत्रकार बनाना थोड़ा सरल। मैं इसी तरह के सत्यवादी पत्रकारों के निर्माण करने व संगठित करने के अभियान में हूँ। मैं अनिवार्य प्रश्न अखबार और स्टिंग आॅपरेशन योजना की धरातल पर पत्रकारिता, उसके प्रशिक्षण व सामाजिक उत्थान के अनूठे अभियान में देश की सेवा हेतु समस्त सत्यवादी मनुष्यों को आमंत्रित करता हूँ।

आइए हम अपनी सद्भावनाओं व सात्विक ज्ञान को पुनः जीवित करें, और भावना एवं मानवता रहित सरकारी मिशनरी के साथ ही साथ उन तमाम असामाजिक-अमानवीय तत्वों के विनाश के लिए स्टिंग आॅपरेशन व पत्रकारिता के अंग बनें।

हम सभी को लड़ना होगा, अपने लिए, अपनों के लिए। क्योंकि समय और समाज के इस पड़ाव पर अब, दूसरा और कोई रास्ता भी नहीं है।

हमने आपके लिए सफर चुना है। आप अपने लिए राह चुन लीजिए!


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