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भारत जलाता है हर साल 2,30,000 टन अगरबत्ती, कम पड़ने पर देता है वियतनाम व चीन, अगरबत्ती उपयोग का कुल बाजार मूल्य है 5000 करोड़ रुपये


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कोविड के पश्‍चात की स्थिति भारत के लिए विशाल बांस संसाधनों की सहायता से अपनी अर्थव्‍यवस्‍था को बढ़ावा देने का अवसर है -डॉ. जितेंद्र सिंह


दिल्ली। भारत में प्रतिवर्ष कुल 2,30,000 टन अगरबत्ती की आवश्यकता होती है और इसका बाजार मूल्य 5000 करोड़ रुपये तक है, इसके बावजूद हम काफी बड़ी मात्रा में इसका चीन और वियतनाम जैसे देशों से आयात कर रहे हैं। केन्द्रीय पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) एवं प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह ने पिछले दिनों एक आनलाइन कार्यक्रम में कहा है कि कोविड के पश्‍चात के युग में, पूर्वोत्‍तर क्षेत्र के लिए यह एक अवसर है कि वह भारत को विश्व में प्रतिस्पर्धी और बदले हुए परिदृश्य में आत्मनिर्भर बनने में मदद करे। भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बांस महत्वपूर्ण हैं और यह भारत को अपने बांस संसाधनों की सहायता से आर्थिक शक्ति के रूप में उभरने का अवसर प्रदान करेगा।

वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से यहां बांस कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत का 60 प्रतिशत बांस भंडार पूर्वोत्तर में है और बेहद लाभदायक बात यह है कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्‍व में इस सरकार ने पिछले छह वर्षों में पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है, बांस क्षेत्र को भी इस प्रकार का प्रोत्‍साहन दिया गया है, जैसा उसे आजादी के बाद से कभी नहीं मिला था।

इस कॉन्क्लेव में पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय, केंद्रीय कृषि मंत्रालय के प्रतिनिधियों और विभिन्न क्षेत्रों के हितधारकों ने भाग लिया। इस संबंध में, उन्होंने 100 साल पुराने भारतीय वन अधिनियम में मोदी सरकार द्वारा 2017 में लाए गए संशोधन का उल्लेख किया, जिसके परिणामस्वरूप, बांस के माध्यम से आजीविका के अवसरों को बढ़ाने के लिए घर में उगने वाले बांस को इसमें से छूट दी गई है।

डॉ. सिंह ने आगे कहा कि सरकार ने जिस संवेदनशीलता के साथ बांस के प्रचार के महत्व पर विचार किया है, वह इस तथ्य से स्पष्ट हो जाता है कि लॉकडाउन के दौरान गृह मंत्रालय द्वारा 16 अप्रैल को विभिन्न क्षेत्रों में सीमित गतिविधियों की अनुमति देते हुए बांस से संबंधित रोपण, प्रोसेस आदि जैसी गतिविधियों को भी अनुमति दी गई।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि निकट भविष्य में, पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय बांस विनिर्माण और व्यापार को बढ़ावा देने के लिए समयबद्ध योजना बनाने की कोशिश करेगा और इस क्षेत्र में सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) की व्यवहार्यता पर भी काम करेगा। उन्होंने कहा कि बांस को जैव-डीजल और हरित ईंधन, इमारती लकड़ी और प्लाईवुड जैसे कई उत्पादों में संसाधित किया जा सकता है, जो अर्थव्यवस्था की पूरी तस्‍वीर बदल सकते हैं और विविध क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों का सृजन कर सकते हैं।

कॉन्क्लेव में अपने विचार प्रकट करने वालों में पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय में विशेष सचिव इंदीवर पांडेय, केंद्रीय कृषि मंत्रालय में अपर सचिव अलका भार्गव, पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय में संयुक्‍त सचिव रामवीर सिंह, शैलेंद्र चैधरी एमडी सीबीटीसी और नॉर्थ ईस्‍ट हैंडीक्राफ्ट एंड हैंडलूम डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनईएचएचडीसी) और राष्ट्रीय बांस मिशन के सदस्य एवं और पूर्व मंत्री अन्ना साहब एमके पाटिल शामिल थे। कॉन्क्लेव का संचालन इंडियन फेडरेशन ऑफ ग्रीन एनर्जी (आईएफजीई) के महानिदेशक संजय गंजू ने किया था।

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