अनिवार्य प्रश्न

पूर्वांचल में प्राइवेट कर्मचारियों की अटकी है सेलरी चंदौली, वाराणसी सहित आसपास के जनपदों का यही हाल

अनिवार्य प्रश्न । संवाद


सिर्फ कागज पर दौड़ा सरकार का आदेश
अनेक प्राइवेट कर्मचारियों की नहीं मिली तनख्वाह
निजी सेक्टर के अस्पतात, स्कूल, फर्म रोके हैं सेलरी


चन्दौली-वाराणसी। वाराणसी सहित कई जिलों में निजी सेवाओं में लगे लोगों की अभी तक तनख्वाह अटकने की पुख्ता सूचना मिली है। चन्दौली, वाराणसी एवं पूर्वांचल के अन्य कई जनपदों से प्राप्त सूचनाओं के अनुसार बहुत सारे संस्थानों ने अपने कर्मचारियों की तनख्वाह नहीं दी है। जिसमें कई अस्पताल, प्राइवेट चिकित्सा केन्द्र, बड़े-बड़े स्टोर चलाने वाले संचालक, स्कूल, कॉलेज एवं कई व्यापारियों ने भी अपने नौकरों की अभी तक तनख्वाह नहीं दी है।

सुूत्रों के हवाले से आई जानकारी के अनुसार यह तनख्वाह मार्च महीने की रोकी गई है। जिसमें निजी कर्मचारियों के किये गये काम के दिनों की संख्या लगभग 20 थी। उल्लेखनीय है कि अधिकतर निजी संस्थानों में पिछले महीने की सेलरी आगामी महीने की 5 से 15 तारीख तक दी जाती है। जबकि लाकडाउन 20 तारीख से शुरू हुआ था। उस समय फरवरी महीने की तनख्वाह दी जा चुकी थी। लेकिन तब-तक मार्च महीने की तनख्वाह जारी नहीं की गई थी। सोचने वाली बात यह है कि लगभग 20 दिन सेवा देने क बाद भी तनख्वाह देने में निजी संस्थाओं को अगर यह दिक्कत है तो पूरा महीना बैठने के बाद प्राइवेट सेवादारों को अगले महीने कौन सी तनख्वाह मिलने वाली है। दर्दनाक है कि आगे के महीनों में उन्हें तनख्वाह तो नहीं मिलेगी वर्तमान समय में अपनी पिछले किए गए काम की भी वह तनख्वाह पाने से महरूम है।

केंद्र सरकार व प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस बारे में एडवाइजरी जारी की थी और उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री कार्यालय ने भी एक निर्देश जारी करते हुए बताया था कि कोई भी निजी संस्थान अपने कर्मचारियों की तनख्वाह नहीं रोकेगा। लेकिन प्राइवेट स्कूल, कॉलेज, अस्पताल व अन्य प्रतिष्ठान संचालक अपने कर्मचारियों की तनख्वाह अभी तक रोके हुए हैं। पाठकों को यह जानकर और भी दुख होगा कि स्थानीय प्रशासन द्वारा प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री कार्यालय के पत्रों को स्कूलों, कालेजों, अस्पतालों के प्रबंधकों तक और व्यापारिक प्रतिष्ठानों तक प्रचारित कर तो दिया गया लेकिन उसका कोई सही क्रियान्वयन नहीं हुआ और ना ही उस निर्देश का कितना पालन हुआ इसकी मॉनिटरिंग हुई है।

हमारे सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार चंदौली और वाराणसी में तो जिला प्रशासन पूरी तरह से तनख्वाह के निस्तारण व उसकी मॉनिटरिंग में विफल रहा है। अब ऐसे में चन्दौली व वाराणसी जिला प्रशासन के अधिकारी क्या कार्य कर रहे हैं यह सोचना दिलचस्प है। नागरिकों का कहना है कि जिला प्रशासन को ध्यान देना चाहिए कि प्राइवेट सेवाओं के जो कर्मचारी अपने घरों में में बंद हैं वह कैसे कैसे जी रहे हैं। ऐसे बहुत से मध्यमवर्गीय लोग हैं जो ना ही प्रशासनिक वितरण प्रणाली से प्राप्त होने वाले खाना को मंगा रहे हैं और ना ही अपने पड़ोस में अपनी निर्धनता को जाहिर होने दे रहे हैं, महीनों तक घरों में छुपे हैं तो कैसे जी रहे हैं?

कहीं उनकी जान न जाए यह सोचना भी प्रशासन का काम है। अनेक ऐसे मध्यम परिवार के लोग हैं जो किसी से कहते नहीं कि उनकी दशा क्या है, वह अपने-अपने घरों में बंद हैं। यह भी हो सकता है कि उनके पास आवश्यक जरूरतों की खरीद करने के लिए भी पैसे नहीं हो। प्राइवेट सेक्टर से जुड़े संस्थान जिनके पास पर्याप्त धनराशि है उसके बाद भी उनका अपने नौकरों को पैसा न देना कितनी निंदाजनक बात है। इस संबंध में जब स्थानीय सीएमओ एवं डीआइओएस से बात की गई तो उन लोगों ने पूरे मामले से अनभिज्ञता जाहिर की। वह कहे कि ऐसे कोई प्रतिष्ठान की जानकारी तो नहीं है हालांकि निर्देश दे दिए गए थे। अब अनुपालन कहां तक हुआ है यह पता नहीं है।

चिन्ता की बात है कि स्थानीय प्रशासन को कुछ पता नहीं है। आखिर उनको पता क्या है? और महीनों से जब उनके पास जनरल कार्य नहीं रह गए हैं सिर्फ लाकडाउन में जनता की सेवा का कार्य ही है तो वह क्या कर रहे हैं। सिर्फ कागज पर आदेश दौडाने से प्राइवेट कर्मचारियों के घर रुपया नहीं पहुंच चाएगा।

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