अनिवार्य प्रश्न

ये मजदूर औरतें -दीपक शर्मा, जौनपुर, उत्तर प्रदेश-मजदूर दिवस विशेष

 

ये मजदूर औरतें
दिन रात करती हैं काम
नहीं जानती आराम
चलाती हैं फावड़ा
खोदती हैं मिट्टी
पाथती हैं ईंट
छाती के बल खीचती हैं सगड़ी
दूधमूँहें बच्चे को
लादकर पीठ पर
ढोती हैं ईंट,
खाती हैं खैनी
पीती हैं बीड़ी,

ये मजदूर औरतें
न जाने किस काठ की बनी होती हैं
ईंट को ट्रैक्टर पर लादती हैं
उसे गंतव्य स्थान तक पहुँचाती हैं
यही काम बार-बार दोहराती है
फुरसत मिलते ही
फिर पाथने लगती हैं ईंट
इनके नंग-धड़ंग बच्चे
गिली मिट्टी
या धूल में
बहलाते हैं मन
रोते हैं जब
वे काम रोककर
पिला आती हैं
दूध,
या पानी,
और सुला आती हैं
जमीन पर
किसी भीत की छांव में।

ये मजदूर औरतें
बीमार नहीं होतीं
होतीं भी हैं तो
इनकी सुधि कौन लेता है
और बीमार नहीं होते
इनके बच्चे
प्रसव पीड़ा में
इनके साथ कौन होता है?
इनके बच्चों के मरने से
दुःख किसको होता है?

हम दिखाते हैं
देश को विकास का माॅडल।

ये मजदूर औरतें
करती हैं खुले में
शौच और स्नान,

इनके मालिक
बुझा लेते हैं
इनके जिस्म से
अपने जिस्म की प्यास,

इनकी बेटियाँ
व्याही नहीं जाती
अक्सर,
किसी दलाल के हाथों
बेच दी जाती हैं,
भगा ली जाती हैं,
चुरा ली जाती हैं,
या उठा ली जाती हैं,
यौवन झर जाने के बाद
वापस आ जाती हैं,
किसी भट्ठे पर करने मजदूरी,़

इनके यहाँ
रश्म रिवाज नहीं होता
बिना दिशाशूल जाने कहां-कहां
चली जाती हैं
एक गाँव से दूसरे गाँव,

इन्हें माना गया है अछूत,
नहीं पीते हैं कई इनके हाथ का पानी,
वे भूल जाते हैं,
मन्दिर की ईटें,
और उनके आलीशान बंगले से
चिपका होता है
किसी मजदूर स्त्री का श्रम,
हड़प्पा,  मोहनजोदड़ों की सभ्यता के विकास में
था किसी मजदूर स्त्री का योगदान,
लाल किला,  कुतुबमिनार,  ताजमहल
और संसद की दीवारों से
आती है इनके पशीने की बू,
स्कूल की दीवारें इसलिए नहीं हिलती
क्योंकि इसमें सना होता है
किसी तपित मजदूर स्त्री का लहू,

ये मजदूर स्त्रियाँ
रहती हैं सदैव हाशिए पर,
पर इनके बिना
विकास का रास्ता नहीं खुलता,
पर, इन्हें नहीं मिलता
लाॅकडाउन में कोई मुआवजा।
इन्हें नहीं मिलता
विधवा या वृद्धा पेंशन
कहने को तो ये भी कहती हैं –
सरकार माई-बाप हैं
सरकारे आती हैं
सरकारे जाती हैं
मगर ये पाथती रहती हैं
किसी भट्ठे पर ईंट दर ईट।

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