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Know who affects the white fungus the most - Sunita Johri

व्हाइट फंगस किन्हें सबसे ज्यादा प्रभावित करता है जाने? – सुनीता जौहरी


व्हाइट फंगस की नई व खतरनाक बीमारी, उसके लक्षण व उससे उत्पन हुए सामयिक परिस्थिति पर समाचारीय रिपोर्ताज प्रस्तुत कर रही हैं लेखिका – सुनीता जौहरी


व्हाइट फंगस तब भी हो सकता है जब लोग पानी के संपर्क में आते हैं या मोल्ड युक्त गंदे वातावरण में आते हैं। यह रोग संक्रामक नहीं है, लेकिन ये महत्वपूर्ण अंगों में फैल सकता है। व्हाइट फंगस का संक्रमण ब्लैक फंगस से ज्यादा खतरनाक होता है क्योंकि इसका फेफड़ों और शरीर के अन्य अंगों पर तीव्र प्रभाव पड़ता है।

देश में ब्लैक और व्हाइट दोनों फंगस के मामले सामने आए हैं। नई दिल्ली के कई विशेषज्ञों का मानना है कि व्हाइट फंगस, ब्लैक फंगस की तुलना में ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। हालांकि भारत में म्यूकरमाइकोसिस के मामलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है जिसे आम तौर पर ब्लैक फंगस के नाम से जाना जाता है। और देश कोरोना वायरस की जानलेवा दूसरी लहर से जूझ रहा है। केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से ब्लैक फंगस संक्रमण (म्यूकरमाइकोसिस) को महामारी रोग अधिनियम 1897 के तहत अधिसूच्य बीमारी बनाकर सभी मामलों की सूचना देने आग्रह किया था। सरकार ने यह भी कहा है कि इस संक्रमण से कोविड-19 रोगियों में दीर्घकालिक रुग्णता और मौतों की संख्या में वृद्धि हो रही है. हालांकि अब मिल रही रिपोर्ट्स के मुताबिक व्हाइट फंगस के मामले भी परेशानी बढ़ा रहे हैं और ये ब्लैक फंगस से भी ज्यादा जानलेवा साबित हो सकते हैं।

माइक्रोबायोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ एसएन सिंह ने कहा कि नए पाए गए फंगल संक्रमण से मरीजों को ऑक्सीजन सपोर्ट न मिलने का खतरा है और इससे त्वचा को नुकसान हो सकता है। उन्होंने कहा कि अगर इसकी जानकारी देर से मिलती है तो संक्रमण से मौत भी हो सकती है। डॉक्टर ने कोविड-19 और कोरोना से उबर रहे लोगों को व्हाइट फंगस को गंभीरता से लेने की अपील की है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, विशेषज्ञों के मुताबिक व्हाइट और ब्लैक दोनों ही फंगस संक्रमण ‘म्यूकरमाइसेट्स’ नामक फंगस के सांचे के कारण होते हैं जो पर्यावरण में मौजूद होते हैं। व्हाइट फंगस का संक्रमण ब्लैक फंगस से ज्यादा खतरनाक होता है क्योंकि इसका फेफड़ों और शरीर के अन्य अंगों पर तीव्र प्रभाव पड़ता है. व्हाइट फंगस अधिक घातक हो जाता है क्योंकि जैसे यह फैलता है ये महत्वपूर्ण अंगों को बहुत नुकसान पहुंचाता है। यह मस्तिष्क, श्वसन अंगों, पाचन तंत्र, गुर्दे, नाखून या यहां तक ​​कि निजी अंगों को भी प्रभावित कर सकता है।

यह तब भी हो सकता है जब लोग पानी के संपर्क में आते हैं या मोल्ड युक्त गंदे वातावरण में आते हैं. यह रोग संक्रामक नहीं है, लेकिन ये महत्वपूर्ण अंगों में फैल सकता है और जटिलताओं का कारण बन सकता है। कम रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग, मधुमेह, कैंसर या नियमित रूप से स्टेरॉयड का उपयोग करने वालों को व्हाइट फंगस से संक्रमित होने का अधिक खतरा होता है।

आईसीएमआर-स्वास्थ्य मंत्रालय की एक एडवाइजरी में कहा गया है कि इस बीमारी के प्रमुख जोखिम कारकों में अनियंत्रित डायबिटीज, स्टेरॉयड द्वारा इम्यूनोसप्रेशन, लंबे समय तक आईसीयू में रहना, घातकता और वोरिकोनाजोल थेरेपी शामिल हैं।

व्हाइट फंगस
व्हाइट फंगस संक्रमण के मरीजों में कोविड-19 जैसे समान लक्षण दिखाई देते हैं। पटना के अस्पताल में रिपोर्ट किए गए चार व्हाइट फंगस मामलों में कोरोना से संबंधित लक्षण दिखाई दिए, लेकिन वह कोरोना से संक्रमित नहीं पाए गए। सभी मामलों में मरीजों के फेफड़े संक्रमित पाए गए। इसके लक्षण भी ब्लैक फंगस के समान हो सकते हैं।

चूंकि व्हाइट फंगस फेफड़ों और छाती को प्रभावित करता है, इससे खांसी, सीने में दर्द, सांस फूलना हो सकता है. इससें सूजन, संक्रमण, लगातार सिरदर्द और दर्द हो सकता है। एक्स-रे और सीटी स्कैन के माध्यम से संक्रमण का पता लगाया जा सकता है। रोगियों को इसके इलाज के लिए एंटी-फंगल दवा दी जाती है। पटना में सामने आए मामलों में मरीजों को ऐंटिफंगल दवाएं दी गईं और वे ठीक हो गए। अब मिल रही रिपोर्ट्स के मुताबिक व्हाइट फंगस के मामले भी परेशानी बढ़ा रहे हैं और ये ब्लैक फंगस से भी ज्यादा जानलेवा साबित हो सकते हैं।

लेखिका वाराणसी, उत्तर प्रदेश की रहने वाली हैं। लेखिका के उक्त अपने तथ्य व विचार हैं।

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