अनिवार्य प्रश्न
Tribute Memoir: The pen has started crying while writing in memory of my friend Sajal ... Mahendra Nath Tiwari 'Alankar'

श्रद्धांजलि संस्मरण: मेरे मित्र सजल की याद में लिखते हुए कलम रोने लगी है… महेन्द्र नाथ तिवारी ‘अलंकार’


श्रद्धांजलि संस्मरण


अनिवार्य प्रश्न अखबार समूह व उद्गार परिवार से वर्षों से जुड़े रहे वरिष्ठ कवि व लेखक श्री राधेश्याम तिवारी ‘सजल’ विगत 04 सितम्बर 2020 को काशी के साहित्य के आंगन को छोड़ गए। नाराज होकर नहीं, नियति से मजबूर होकर। उनका पूरा साहित्यिक व संबंधी समाज रो रहा है और कोस रहा विधाता को तथा उसके क्रूर फैसले को।
उनके जाने की बात कोई स्वीकार नहीं कर पा रहा। सबको ऐसे लग रहा कि कोई कह दे कि यह खबर झूठी है। पूरा साहित्यिक समाज सहमा हुआ है। कोई कुछ लिखना चाह रहा है पर लिखा नहीं जा रहा। नगर के वरिष्ठ साहित्यकारों व उनके साथ रहने वालों में शामिल छतिश द्विवेदी कुठित, हीरालाल मिश्र मधुकर, योगेन्द्र नारायण चतुर्वेदी वियोगी, दीनानाथ द्विवेदी रंग, श्रीमती शिब्बी हर्षवर्द्धन ममगाईं, सूर्यप्रकाश मिश्र व आकाश उपाध्याय का कहना है कि उनका जाना बनारस के साहित्य के आकाश से सूरज का गुम जाना है। हम ऐसे सरल व सजल साहित्यकार को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपने पाठकों व उनके चाहने वालों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं काशी के वरिष्ठ कवि व शाइर महेन्द्र नाथ तिवारी ‘अलंकार’ का एक लघु संस्मरण-


…आज, मैं जब रात में उदास बैठा हूँ, मेरे ३६वर्षों के अभिन्न मित्र श्री राधे श्याम तिवारी ‘सजल’ की मृत्यु अन्दर तक झकझोर रही है। हम दोनों ने एक साथ एक ही काॅलेज में ३०वर्षों तक शिक्षण कार्य किया, मानसिक और वैचारिक स्तर पर हम लोगों में ऐसा सामंजस्य व एक रुपता थी कि आजतक मतभेद का अवसर ही नहीं आया।
मेरे प्रिय सजल जी, बहुत ही सरल, सहज, निष्कपट तथा सहयोगी स्वभाव के व्यक्ति थे।

हिन्दी के कुशल अध्यापक होने के कारण उनकी भाषा और भाव पर अच्छी पकड़ थी। शिक्षक कक्ष में हम एक दूसरे को अपनी-अपनी रचना सुनाया करते थे। चूंकि मैं पहले से कवि मंचों पर जाता रहा था, इसलिए वेे मुझे मान सम्मान देते थे। एक बार मैंने उनसे कहा तिवारी जी आप इतने सुन्दर और उत्कृष्ठ गीत लिखते हैं, मंचो पर क्यूं नहीं चलते। कुछ झिझकते हुए मैंने फिर कहा कि मैं आपको ले चलूंगा। कुछ समय के बाद मैं एक कवि सम्मेलन में उन्हें ले गया। उसके बाद तिवारी जी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक स्थापित गीतकार के रूप में प्रसिद्धि पायी।

अभी हाल समय जब रात के सवा ग्यारह बज रहे हैं मै व्यथित हूँ। और यही सब बातें याद करके मेरी सजल आंखों के कोरों से बूंद-बूंद अश्रु टपक रहा है। अब आगे कुछ लिखा नहीं जा रहा…..

बुझ गई शम्मां मगर उसकी निशानी रह गयी,
जिन्दगी चुपचाप चल दी, बस विरानी रह गयी।
तोड़ कलियां हाथ में ले मुस्करा माली चला,
शाख पर बेदर्दियों की बस कहानी रह गयी।

…शेष फिर कभी।

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