Sugar prices did not rise due to ethanol; government dismisses claims, cites hoarding and low production as reasons.Sugar prices did not rise due to ethanol; government dismisses claims, cites hoarding and low production as reasons.

अनिवार्य प्रश्न। संवाद।

नई दिल्ली । त्योहारी सीजन से ठीक पहले चीनी की कीमतों में आई अचानक तेजी ने बाजार और आम उपभोक्ताओं में चिंता बढ़ा दी है। इस बीच यह दावा किया जा रहा था कि पेट्रोल में मिश्रण के लिए चीनी को इथेनॉल उत्पादन की ओर डाइवर्ट किए जाने से घरेलू बाजार में इसकी कीमतें बढ़ रही हैं। हालांकि, खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने शुक्रवार को एक आधिकारिक बयान जारी कर इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया। सरकार ने स्पष्ट किया है कि कीमतों में बढ़ोतरी का संबंध इथेनॉल से नहीं, बल्कि कम घरेलू उत्पादन, आगामी त्योहारी सीजन की मांग और जमाखोरी से है। सरकार ने त्योहारों में कीमतों को काबू में रखने के लिए शुल्क-मुक्त आयात और स्टॉक सीमा जैसे कड़े नीतिगत कदम भी उठाए हैं।

आधिकारिक बयान में कहा गया कि एथेनॉल उत्पादन के लिए उपयोग हो रही चीनी का शेयर 2025-26 में कम होकर करीब 9 प्रतिशत हो गया है, जो कि 2022-23 में करीब 12 प्रतिशत था। साथ ही, कहा कि मौजूदा समय में देश में एथेनॉल के उत्पादन के लिए मक्के का उपयोग हो रहा है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, केवल एक महीने के भीतर चीनी की खुदरा कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। बीते 20 जुलाई को खुदरा चीनी की औसत कीमत 48.18 रुपये प्रति किलोग्राम थी, जो 20 अगस्त को बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई। मंत्रालय ने इस बढ़ोतरी के लिए कम घरेलू उत्पादन, आगामी त्योहारी सीजन की बढ़ी मांग, मौसम के कारण फसलों को नुकसान, तंग वैश्विक आपूर्ति और बाजार के कुछ हिस्सों में सट्टेबाजी व जमाखोरी को जिम्मेदार ठहराया है।

सरकार ने आंकड़ों के साथ स्पष्ट किया है कि इथेनॉल कार्यक्रम पर महंगाई का दोष मढ़ना पूरी तरह गलत है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इथेनॉल उत्पादन के लिए डाइवर्ट की जाने वाली चीनी की हिस्सेदारी 2022-23 सीजन के 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 सीजन में महज 9 प्रतिशत रह गई है। इसके अलावा, वर्तमान में भारत के कुल इथेनॉल उत्पादन का लगभग तीन-चौथाई (75ः) हिस्सा गन्ने के बजाय अनाजों, विशेष रूप से मक्के से प्राप्त हो रहा है। जमाखोरी रोकने और आपूर्ति सुधारने के लिए सरकार ने क्या सख्त कदम उठाए हैं त्योहारों के दौरान चीनी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने और कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए सरकार ने बहुआयामी रणनीति अपनाई है

इस सीजन में देश का कुल चीनी उत्पादन शुरुआती अनुमानित 34.3 मिलियन टन के मुकाबले लगभग 30.6 मिलियन टन रहने का अनुमान है। इस गिरावट का मुख्य कारण गन्ने की फसल में रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियां और अत्यधिक बारिश से हुआ जलभराव है। हालांकि, नया पेराई सीजन शुरू होने तक घरेलू मांग के लिए मौजूदा स्टॉक पर्याप्त है। वैश्विक मोर्चे पर भी आपूर्ति तंग है; साल 2026-27 में करीब 3.3 मिलियन टन चीनी की कमी का अनुमान है, जिससे वैश्विक कीमतें 30 जून के 474 डॉलर प्रति टन से 16ः बढ़कर 20 अगस्त को 552 डॉलर प्रति टन हो गई हैं।

भारत आमतौर पर सालाना 32-34 मिलियन टन चीनी का उत्पादन करता है, जबकि घरेलू खपत 28-29 मिलियन टन है। अधिशेष के वर्षों में मिलों की कार्यशील पूंजी अटकने से किसानों के भुगतान में देरी होती थी। इथेनॉल कार्यक्रम ने इस ढांचागत अधिशेष की समस्या को सुलझाया है और मिलों को मजबूत वित्तीय आधार दिया है। मिलों की वित्तीय स्थिति सुधरने से 20 अगस्त तक 2025-26 सीजन के गन्ना बकाए का 97ः भुगतान किया जा चुका है। साथ ही, सब्सिडी पर मिलों की निर्भरता कम हुई है; 2014-2021 के बीच सरकार ने 14,600 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी थी, लेकिन 2021-22 के बाद से कोई नई सब्सिडी जारी नहीं की गई है।

Powered by Syahi Prakashan | Anivarya Prashna News & Web Group