The Battle for AI Supremacy: China Narrows Gap with US, Global Concerns RiseThe Battle for AI Supremacy: China Narrows Gap with US, Global Concerns Rise

अनिवार्य प्रश्न। संवाद।

नई दिल्ली।आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब सिर्फ एक नई तकनीक नहीं रह गई है। दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस तैयार करने की दौड़ में लगी हुई हैं, जो इंसानों की तरह सोचने, सीखने और जटिल काम खुद करने में सक्षम हों। एआई का जिस तेजी से विकास हो रहा है, वह चिकित्सा, विज्ञान, कारोबार और साइबर सुरक्षा जैसे कई क्षेत्रों में बड़े बदलाव ला सकता है। हालांकि, जैसे-जैसे एआई ज्यादा ताकतवर होता जा रहा है, वैसे-वैसे इससे जुड़े खतरों को लेकर चिंता भी बढ़ रही है। सवाल अब यह है कि एआई का जिस तेजी से विकास हो रहा है, क्या वह सही है इस बहस को नया मोड़ तब मिला, जब एंथ्रोपिक के सीईओ डारियो अमोदेई ने एआई के विकास की रफ्तार कम करने की जरूरत बताई। उनके मुताबिक सुपर-इंटेलिजेंट एआई सिस्टम के संभावित खतरों को नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा। अमोदेई का कहना है कि अगर पर्याप्त सुरक्षा के बिना एआई का विकास बहुत तेजी से किया गया, तो यह जोखिम भरा हो सकता है।

अमोदेई की इस चिंता को ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन और एक्स के मालिक एलन मस्क का भी समर्थन मिला। ऑल्टमैन ने कहा कि वह अमोदेई की बात से सहमत हैं। वहीं एलन मस्क ने भी अमोदेई की चिंता को जायज बताया। गौर करने वाली बात है कि अमोदेई की चिंता सिर्फ एआई की सुरक्षा तक सीमित नहीं है। उन्होंने अमेरिका और चीन के बीच चल रही एआई रेस को लेकर भी बड़ा सवाल उठाया है। अमोदेई ने चेतावनी दी है कि अगर एआई की वैश्विक दौड़ में चीन अमेरिका से आगे निकलता है, तो यह सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

इसी वजह से उन्होंने अमेरिकी सरकार से चीन को भेजी जाने वाली एडवांस्ड सेमीकंडक्टर और कंप्यूटिंग चिप्स पर सख्ती किए जाने की वकालत की है। इसके अलावा उन्होंने मॉडल डिस्टिलेशन पर भी रोक लगाए जाने की बात कही। डारियो का मानना है कि अगर अमेरिका एआई के विकास की रफ्तार को धीमा करता है और चीन ऐसा नहीं करता है, तो स्थिति काफी खतरनाक और चुनौतीपूर्ण हो सकती है।

चीन ने अमोदेई की इस बात का विरोध किया है। चीन का कहना है कि एआई के खतरे के नाम पर डर फैलाना और तकनीकी विकास की रफ्तार को रोकना बिल्कुल भी ठीक नहीं है। चीन के विदेश मंत्रालय के मुताबिक एआई की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सभी पक्षों को मिलकर काम करने की जरूरत है। वहीं चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स का कहना है कि अमोदेई का उद्देश्य एआई नियमों और सुरक्षा का बहाना बनाकर चीन के तकनीकी विकास की रफ्तार को धीमा करना है।

एआई की सुरक्षा को लेकर अमेरिका और चीन के बीच सिर्फ सोच का फर्क नहीं है। आपको इस बारे में समझना होगा कि दोनों देशों के बीच तकनीकी बढ़त को लेकर भी एक बड़ी होड़ चल रही है। अमेरिका जहां अपने बड़े एआई मॉडल, टेक कंपनियों और भारी निवेश के दम पर बढ़त बनाए रखना चाहता है। वहीं चीन तेजी से अपनी एआई क्षमता और तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूत कर रहा है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर इस समय एआई की रेस में अमेरिका और चीन में कौन कितना आगे है?

एआई की रेस में अमेरिका को लंबे समय से दुनिया का सबसे बड़ा खिलाड़ी माना जाता रहा है। बड़ी टेक कंपनियां, भारी निवेश और अत्याधुनिक कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर हमेशा से अमेरिका की ताकत रहे हैं। हालांकि, अब इस नई विश्व व्यवस्था में तस्वीर तेजी से बदलती दिखाई दे रही है। स्टैनफॉर्ड 2026 एआई इंडेक्स रिपोर्ट की मानें तो दुनिया के सबसे बेहतरीन अमेरिकी और चीनी एआई मॉडल्स के बीच परफॉर्मेंस का अंतर घटकर सिर्फ 2.7 फीसदी रह गया है।

यह बदलाव इस कारण भी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि मई 2023 में दोनों देशों के प्रमुख एआई मॉडल्स के बीच अलग-अलग बेंचमार्क पर अंतर 17.5 से 31.6 प्रतिशत तक था। सिर्फ कुछ वर्षों में चीन ने अमेरिकी एआई मॉडल्स के मुकाबले अपना गैप काफी तेजी से कम किया है। मार्च 2026 तक की रैंकिंग में एंथ्रोपिक का Claude Opus 4.6 1,503 के एरिना स्कोर के साथ सबसे आगे था।

वहीं चीन की बाइटडांस का Dola Seed 2.0 Preview 1,464 के स्कोर पर था। दोनों के बीच अंतर सिर्फ 39 अंकों का रह गया। इससे इस बात का स्पष्ट अंदाजा लगाया जा सकता है कि चीन के एआई मॉडल अब अमेरिकी मॉडल्स को कितनी कड़ी चुनौती दे रहे हैं।

गौर करने वाली बात यह है कि चीन की Deepseek R1 ने फरवरी 2025 में कुछ समय के लिए अमेरिका के शीर्ष एआई मॉडल की बराबरी भी कर ली थी। इसके बाद से अमेरिकी और चीनी मॉडल कई बार एक दूसरे से आगे पीछे होते रहे हैं।

सबसे दिलचस्प और रोचक बात निवेश को लेकर है। इस रिपोर्ट की मानें तो अमेरिका में निजी एआई निवेश करीब 285.9 अरब डॉलर रहा, जबकि चीन में यह लगभग 12.4 अरब डॉलर था। यानी अमेरिका ने चीन की तुलना में करीब 23 गुना ज्यादा निजी निवेश किया। इसके बावजूद दोनों देशों के सबसे अच्छे एआई मॉडल्स के बीच अंतर बेहद कम रह गया है।

चीन की ताकत सिर्फ एआई मॉडल्स तक सीमित नहीं है। वह एआई पेटेंट फाइलिंग में दुनिया में सबसे आगे है और वैश्विक पेटेंट फाइलिंग में उसकी हिस्सेदारी करीब 69.7 फीसदी बताई गई है।

एआई से जुड़ी वैज्ञानिक रिसर्च में भी चीन की हिस्सेदारी करीब 23.2 फीसदी है। इसके अलावा चीन औद्योगिक रोबोट के उपयोग में अमेरिका से करीब 9 गुना आगे है। मजबूत ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षमता भी उसके लिए बड़ी ताकत बन रही है।

एक और बड़ा बदलाव एआई टैलेंट को लेकर हुआ है। 2017 के मुकाबले अमेरिका की ओर जाने वाले एआई विशेषज्ञों का माइग्रेशन करीब 89 फीसदी घट गया है। यानी एआई की वैश्विक रेस अब पहले जैसी एकतरफा नहीं रही। अमेरिका के पास पैसा और बड़ी टेक कंपनियां हैं, तो चीन तेजी से रिसर्च, पेटेंट, रोबोटिक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर में अपनी ताकत बढ़ा रहा है। आने वाले वर्षों में यही मुकाबला तय कर सकता है कि एआई की अगली बड़ी छलांग किस देश के हाथ लगेगी।

एडवांस्ड सेमिकंडक्टर चिप्स की रेस में अमेरिका की कंपनियां Nvidia, AMD, Intel फिलहाल चीन से आगे दिख रही हैं। चैटजीपीटी और दूसरे लार्ज लैंग्वेज मॉडल को ट्रेन करने में जिन चिप्स का उपयोग हो रहा है उनकी डिजाइनिंग पूरी तरह अमेरिकी कंपनियां कर रही हैं। इनमें Nvidia की H200 और दूसरी चिप्स शामिल हैं। इन सब के अलावा चिप्स बनाने के लिए जो इलेक्ट्रॉनिक ब्लू प्रिंट तैयार किया जाता है, उसके लिए इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन सॉफ्टवेयर की जरूरत होती है।

इसको बनाने वाली Synopsys, Cadence, और Siemens EDA अमेरिकी तकनीक और नियमों पर आधारित हैं। हालांकि, इस अमेरिकी एकाधिकार को चुनौती देने के लिए चीन ने हाल ही में अपनी कंपनियों और पेकिंग यूनिवर्सिटी की मदद से स्वदेशी एडवांस्ड 3D EDA टूल्स विकसित करने का दावा किया है। इसकी मदद से वह बिना अमेरिकी सॉफ्टवेयर के भी अपनी भविष्य की 1.4nm चिप्स को स्वतंत्र रूप से डिजाइन कर सकेंगे। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि पेकिंग यूनिवर्सिटी का यह टूल अभी सिर्फ एक प्रोटोटाइप है। इसे व्यवसायिक स्तर पर Synopsys या Cadence जितना विश्वसनीय और पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने में अभी कई साल लग सकते हैं।

Goldman Sachs की एक रिसर्च के मुताबिक चीन अगले एक दशक में एडवांस्ड चिप्स के मामले में अपनी विदेशी निर्भरता काफी कम कर सकता है। 7 नैनोमीटर और उससे छोटे चिप्स की घरेलू उत्पादन क्षमता 2025 से 2035 के बीच सालाना करीब 46 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है। इससे घरेलू सप्लाई और मांग के बीच का अंतर 92 प्रतिशत से घटकर 34 प्रतिशत हो सकता है। हालांकि, चीन की सबसे बड़ी कमजोरी अभी भी लिथोग्राफी तकनीक है।

हालांकि, गौर करने वाली बात है कि अमेरिकी प्रतिबंधों और तकनीकी पाबंदियों के बावजूद चीनी कंपनी Huawei लगातार अपनी तकनीकी क्षमता को बढ़ाने का काम कर रही है। कंपनी ने Tau Scaling Law नाम की एक नई तकनीक पेश की है। इसके जरिए जरिए वह ASML की अत्याधुनिक EUV लिथोग्राफी पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रही है। Huawei का लक्ष्य 2031 तक 1.4-नैनोमीटर के बराबर ट्रांजिस्टर डेंसिटी वाले चिप्स को विकसित करना है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि चीन अब Huawei और Alibaba जैसी घरेलू कंपनियों पर निर्भरता बढ़ाकर पूरी तरह से स्वतंत्र सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम तैयार करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

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