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अनिवार्य प्रश्न हिंदी समाचार पत्र एवं हमारी पत्रकारिता


हर कलम बिकती नहीं
अगर पढ़िए तो सिर्फ सच पढ़िए



हमारे समाज में, हमारी दुनिया में, यों तो सब कुछ है और सब कुछ हो रहा है। जिसे कुछ यों समझा जाए तो यहां शहद भी है और जहर भी। शहद को बेचने वाले लोग भी हैं और जहर को भी बेचने वाले लोग हैं। इससे इतर शराब को भी। लेकिन जब एक आम आदमी से पूछा जाए कि आप मानवतावादी दृष्टिकोण से बताइए कि किन चीजों का होना ज्यादा जरूरी है तो वह निश्चित ही जहर और शराब को नहीं स्वीकारेगा। वैसे तो हमारे समाज में कसाई के व्यापार में भी बहुत लोग हैं और ऐसे अनेक लोग भी हैं जो कसाईयों से खराब जीवन जीते हुए भी भिस्ती का काम करते हैं। अगर यहां पर किसी मानवतावादी सोच के मनुष्य से राय ली जाए कि इन दोनों में किसका होना सही है तो वह बिना सोचे समझे एक माली के होने के अस्तित्व को ही ज्यादा ठीक बताएगा। क्योंकि एक अपना जीवन जीने के लिए सैकड़ों जीवन मिटाने की परम्परा व उसका पेशा करना कदापि सही नहीं है, पान तथा फूल को बेचकर भी इसी बाजारु समाज में खुशहाल जीने वाले लोग हमारे आपके बीच में मौजूद हैं।

यह प्रसंग आपसे इसलिए साझा करना पड़ा कि आप उन नैतिक तत्वों को जान लें जो पत्रकारिता के लिए भी स्पष्ट होने चाहिए। पत्रकारिता के संबंध में हमारे समूह का स्थिर और स्पष्ट दृष्टिकोण है। जो एक खास तरह की समाजवादी व समाजहितकारी संकल्पना से ओतप्रोत है। वह यह है कि हम उन्हीं विषयों, समाचारों, आलेखों, संदर्भों व प्रसंगों को ही प्रकाशन योग्य मानते हैं जो समाज के कल्याण के साथ-साथ पत्रकारिता के आदर्श मूल्यों पर खरे उतरते हैं। समाज हित से इतर की सामग्री को हम पत्रकारिता व समाज में लाए जाने की वस्तु नहीं मानते। उदाहरण में आदर्श के आधार को और बल देते हुए आगे बताना है कि आज के समाचार सामग्रियों में बहुत सी ऐसी चीजें, बहुत से ऐसे विषय और अनेक ऐसी शब्दावलियों का प्रयोग आमतौर पर होने लगा है जिनसे जनमानस को परिचित कराने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। जिन्हें हम गॉसिप कह सकते हैं। बहरहाल एक नया चलन लगभग विश्व पत्रकारिता में बहुत जोर पकड़ा हुआ है। मनोरंजन। फिल्म एक ऐसी साझी साहित्यिक विधा है, जिसमें कुछ अनावश्यक बेहद बाजारु प्रयोग व फूहड़ फिल्मांकन को छोड़ दिया जाए तो वह कई प्रकार के विशेषज्ञों व बुद्धिजीवियों द्वारा कई तरह के साहित्यिक, तकनीकी और गहन ज्ञान के अनुप्रयोगों द्वारा निर्मित की जाती है। लेकिन उस विधा से जुड़े समस्त लोगों को और उस विधा से जुड़ी हर चीज को इस समय मनोरंजन के वर्ग में ही रखा जाता है। जब समाज में एक कविता, एक कहानी को साहित्य कहा जा सकता है तो कविता, कहानी, वाद्य यंत्रों के ज्ञान, फिल्म और फोटोग्राफी के ज्ञान, पटकथा लेखन व संवाद लेखन सहित अनेक परिधान की कलात्मक प्रस्तुतियों व उसकी जानकारियों के साथ समिष्ठ होकर की जाने वाली साझी साहित्यिक रचना को मनोरंजन कैसे कह सकते हैं। अगर उसे नाम देकर कहना है एवं और अधिक सरल शब्दावली में उससे जुड़े भाव प्रकट करना है तो उसको फिल्म साहित्य कहना चाहिए। लेकिन अमूमन इन बातों का ध्यान हमारे पाठक नहीं देते हैं, ना ही हमारे व्यापारिक मिजाज वाले पत्रकारिता के समूह।

इसी तरह हमारे पत्रकारिता में ऐसे अनेक शब्द व उनकी कई तालिकाएं हैं जो पूरी तरह निरुद्ध होनी चाहिए। लेकिन वह चलन में हैं। आम अप्रशिक्षित पत्रकार अगर इन शब्दों व प्रतीकों का प्रयोग करें तो बात समझी जा सकती है, पर ऐसे पत्रकारिता के समूह जो विशेषज्ञों से भरे पड़े हैं, वह अगर इस तरह की प्रयोगभूल करते हैं तब वह बात समझ नहीं आती। यह प्रयोगभूल निश्चित रूप से यह उनके व्यापारिक मिजाज और विज्ञापन बटोरने वाली पत्रकारिता की शैली को ही प्रकट करती है। जिसका समाज पर पड़ने वाले असर से उनका कोई लेना-देना नहीं है।

लेकिन हमारे यहां ऐसा नहीं है। हमारा समूह पत्रकारिता को तीन वर्गों में विभाजित करता है। पहला प्रचार वर्ग, दूसरा मुखवक्ता वर्ग और तीसरा समाचारीय वर्ग। अगर इसे अखबार के आधार पर समझना है तो आप जान लें कि हम समाचार पत्रों को तीन वर्गों में बांटते हैं। पहला प्रचारपत्र, दूसरा मुखपत्र एवं तीसरा समाचारपत्र। अब आपको यह जानना भी चाहिए की बहुतायत सरलता से उपलब्ध होने वाले जो पत्र हैं वह प्रचार पत्र ही हो सकते हैं। समाचार पत्र तो तमाम संकटों के दरमियान सही उद्देश्य व समाज हित की कामना से निकाले जाने वाले कुछ विपन्न समाचार समूहों द्वारा निकाले जाने वाले पत्र ही हो सकते हैं। अगर आप इस बात से पूर्ण सहमत नहीं है तो इतना तो आपको मान ही लेना चाहिए कि मेरी बात पूरी तरह नहीं तो कम से कम एक सीमा तक तो सही है ही। अब समाचार समूहों की संख्या जरूर अधिक हो गई है पर आदर्शवादी समूहों की संख्या आज भी बहुत कम है।

हमारे यहां के समाचार की दुनियां में जैसे सब कुछ अलग है। हम समाचारों का पहले समाज हित के पैमाने पर मूल्यांकन करते हैं, सूचनाओं की प्रसारण हेतु आवश्यकता का संदर्भगाम्भीर्य तलाशते हुए उसकी सकारात्मकता और पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव की की समीक्षा करते हैं। तब उसके बाद ही उसे समाज के बीच लाते हैं। हमारे यहां फिल्म कला को फिल्म साहित्य कहा जाता है, मनोरंजन नहीं। हमारे यहां पत्रकारिता एक पूजनीय व गर्व करने की प्रतिमा है व्यापारिक विषय वस्तु नहीं है। हमारे यहां समाचार पत्र मन के परिष्करण का साहित्य है, दुनिया का ज्ञान कराने का सामान नहीं। और ना ही वासनात्मक जिज्ञासाओं के पोषण के लिए तस्वीरनुमा नुमाइसी सनसनी या कहानी। हमारे यहां उसी साहित्य और समाचार सामग्री को स्थान व महत्व मिलता है जो समाज के हित के लिए काम करती हो या उसके आने से समाज में व्यापक जागरण व सही दृष्टकोण का निर्माण हो।

हमें गर्व है कि हम एक आदर्शवादी पत्रकारिता के संस्थान हैं। हमें गर्व है कि हम पत्रकारिता को सभी से कुछ अलग व श्रेष्ठ समझते हैं। हमें गर्व है कि हम पत्रकार हैं। हमें गर्व है कि हम पत्रकारिता के सत्यनिष्ठित निष्पक्ष संस्थान और सही पत्रकारिता के मूल्यों के संवाहक हैं। हमें गर्व है कि हम समाज में सही दृष्टिकोण के प्रचारक हैं। हमें गर्व है कि हम समाज में कुछ सही करने के लिए प्रस्तुत हैं। हमें गर्व है कि हम समाज में सबका भला चाहते हैं। हम आज के बाजार मिजाजी एवं व्यापारिक पत्रकारिता के कथित युग में भी समाज हितनिष्ठ पत्रकारिता को लेकर चल रहे हैं। हमें गर्व है कि हम इस मानवातावादी समाज के अंग हैं। हमें गर्व है कि हम इस दुनिया से बेहद प्रेम करते हैं। हमें इस बात का भी गर्व है कि हम इस दुनिया को और अधिक सौंदर्य के आच्छादित करने के लिए अपने हिस्से का लघु योगदान दे रहे हैं। अगर आप भी इस तरह की आदर्शवादी पत्रकारिता का अंग बनना चाहते हैं तो आपका स्वागत् है