अनिवार्य प्रश्न

असंगठित किसानों के प्रति सभी सरकारों की उदासीनता : सलिल सरोज

असंगठित क्षेत्र के किसानों के जीवन में व्याप्त कठिनाइयां एवं उनके जीवन से जुड़ी चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए किसानों के प्रति भारतीय सरकारों की उदासीनता को रेखांकित कर रहे … Read More

हम किसी और के संसार में रहने लगे हैं…. गांधी विचारक धर्मपाल

धर्मपाल जी विख्यात चिंतक एवं गांधी विचारक हैं। प्रस्तुत है उनका लिखा एक आलेख… भारतीय मानस में सृष्टि के विकास के क्रम और उसमें मानवीय प्रयत्न और मानवीय ज्ञान-विज्ञान के … Read More

श्रद्धांजलि संस्मरण: मेरे मित्र सजल की याद में लिखते हुए कलम रोने लगी है… महेन्द्र नाथ तिवारी ‘अलंकार’

श्रद्धांजलि संस्मरण अनिवार्य प्रश्न अखबार समूह व उद्गार परिवार से वर्षों से जुड़े रहे वरिष्ठ कवि व लेखक श्री राधेश्याम तिवारी ‘सजल’ विगत 04 सितम्बर 2020 को काशी के साहित्य … Read More

लम्बा संघर्ष और अगणित बलिदान के बाद अयोध्या में बस पाए श्रीराम

भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण के लम्बे संघर्ष, उसके धार्मिक व सामाजिक महत्ता और उसके शिलान्यास में प्रयुक्त हर ईंट में भरे भावसिक्त संदेश को समझा रहे हैं नोएडा के … Read More

34 सालों बाद बदली शिक्षा की सूरत

नई शिक्षा नीति अंग्रेजी के साथ मातृभाषा के अलावा संस्कृत व देश की अन्य भाषाओं के सीखने पर जोर देने वाली है ऐसा मानते हुए विश्लेषण कर रहे हैं लेखक … Read More

मुंशी प्रेमचंद के 140 वें जन्मदिवस के अवसर त्रिदिवसीय चित्रकला प्रतियोगिता का हुआ आयोजन

अनिवार्य प्रश्न । ब्यूरो संवाद वाराणसी। कहानी सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी के 140 वें जन्मदिवस के अवसर पर महापंडित राहुल सांकृत्यायन शोध एवं अध्ययन केंद्र वाराणसी द्वारा उनके प्रसिद्ध उपन्यास … Read More

‘गोदान’ का सामाजिक विस्तार : विन्ध्यवासिनी मिश्रा

’गोदान’ का सामाजिक विस्तार औपनिवेशिक भारत में तमाम आर्थिक सामाजिक शैक्षिक असमानताओं या यूँ कहें कि अनेक असंतुलनों के काल में महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद जी के लेखन की पराकाष्ठात्मक … Read More

सामयिक संस्मरणीय आलेख: कोरोनाकाल में एक सफर: प्रफुल्ल सिंह ‘बेचैन कलम’

‘‘कोरोनाकाल में एक सफर’’ में जीवन की दुश्वारियों व नवप्रकट असंतुलित संवेदनाओं पर अतिसरलता पूर्वक अतिसामयिक संस्मरणीय आलेख प्रस्तुत कर रहे हैं साहित्यकार प्रफुल्ल सिंह ‘बेचैन कलम’ जीवन हमेशा एक-सा … Read More

आलेख: बाजारवाद की हमजोली बना दी गई सुन्दरता: सलिल सरोज

भौतिक युग में आज तक अपरिभाषित सुन्दरता, उसमें भटके स्त्री समाज और उसपर सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के षणयन्त्र से आधिपत्य किए पूँजीवाद के क्षद्म की बेमिशाल भाव परिक्रमा कर रहे हैं … Read More

सुशांत, आखिर क्यों, सुशांत? -सलिल सरोज

समाज में किसी भी एक व्यक्ति के द्वारा की गई आत्महत्या को पूरे समाज की सामूहिक असफलता माकर अनेक अनिवार्य प्रश्न खड़े कर रहे हैं वरिष्ठ लेखक सलिल सरोज आत्महत्या … Read More