अनिवार्य प्रश्न। ब्यूरो संवाद। वाराणसी । अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी ने दिल्ली में संसद की ओर किए गए मार्च और उससे उत्पन्न कानून-व्यवस्था की स्थिति पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि भारत का लोकतंत्र प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार देता है। किंतु किसी भी संगठन या समूह को कानून एवं प्रशासनिक निर्देशों की अवहेलना कर अति-संवेदनशील क्षेत्रों की ओर बढ़ने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि किसी प्रदर्शन को प्रशासन द्वारा अनुमति नहीं दी गई हो और इसके बावजूद संसद जैसे सर्वाेच्च लोकतांत्रिक संस्थान की ओर बढ़ने का प्रयास किया जाए, विशेषकर संसद सत्र के दौरान या उसके निकट, तो यह केवल विरोध-प्रदर्शन का विषय नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का गंभीर प्रश्न बन जाता है। त्रिपाठी ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में पुलिस एवं सुरक्षा एजेंसियों द्वारा कानून के अनुरूप आवश्यक और न्यूनतम बल का प्रयोग कर स्थिति को नियंत्रित करना एक वैधानिक एवं आवश्यक कदम है। लोकतंत्र का अर्थ अराजकता, सुरक्षा घेरा भंग करना अथवा संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव बनाना नहीं है। संसद 140 करोड़ भारतीयों की लोकतांत्रिक आस्था का सर्वाेच्च प्रतीक है, जिसकी सुरक्षा प्रत्येक नागरिक और राज्य की सर्वाेच्च जिम्मेदारी है। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों एवं सामाजिक संगठनों से अपील की कि वे अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग संविधान और कानून की मर्यादाओं के भीतर रहकर करें। किसी भी प्रकार की हिंसा, उग्र प्रदर्शन, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने अथवा सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देने जैसी गतिविधियाँ लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं हैं। अंत में अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी ने कहा कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति संविधान, कानून के शासन और शांतिपूर्ण संवाद में निहित है। किसी भी परिस्थिति में कानून से ऊपर कोई नहीं हो सकता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा एवं सुरक्षा की रक्षा सर्वाेच्च प्राथमिकता रहनी चाहिए। Post navigation धार- नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत अभियान की प्रतियोगिताओं के लिए आवेदन 23 जुलाई तक प्रदेश की प्रत्येक ग्राम पंचायत में प्रत्येक शुक्रवार को आयोजित होगी ‘ग्राम चौपाल’…..उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य