हाँ, तो बात हो रही थी— “अधिकारी होना: मज़ा भी और सज़ा भी।” तो आइए देखें कैसे अधिकारी होना मज़ा और सज़ा दोनों होता है। अधिकारी बनने पर जहाँ एक ओर ज़िम्मेदारियाँ आती हैं, वहीं कई अन्य परेशानियों से भी रूबरू होना पड़ता है। लेकिन यह भी सच है कि…. मित्रों! अधिकारी कौन नहीं होना चाहता? प्रत्येक प्रतियोगी परीक्षार्थी की चाहत होती है कि परीक्षा पास कर वह अधिकारी बने, लेकिन अधिकारी बनना इतना आसान नहीं। अधिकारी बनने हेतु अनेकानेक परीक्षाएँ देनी पड़ती हैं और यदि कोई अधिकारी बन भी गया, तो उस पर तमाम तरह की ज़िम्मेदारियाँ भी आती हैं। एक कहावत भी प्रचलित है कि जो ताज पहनता है, उस पर अनेक परेशानियाँ भी आती हैं— “Uneasy lies the head that wears a crown.” कभी-कभी अधिकारियों की पोस्टिंग ऐसे स्थानों पर हो जाती है, जहाँ आवागमन के साधन नहीं होते और ऑफिस में सुविधाओं की कमी होती है। कभी दूर-दराज़ के इलाकों में तैनाती हो जाती है, जो निर्जन व एकांत होते हैं, जहाँ परिस्थिति-जन्य असुविधाएँ होती हैं। सबसे ज़्यादा परेशानी मानवीकृत समस्याओं से होती है, जिनसे अधिकारी आजकल ज़्यादा परेशान रहते हैं। उच्च अधिकारी अनावश्यक दबाव बनाते हैं। ग़लत काम कराने हेतु कभी-कभी तो उच्च अधिकारी कहते हैं कि— “क्या चाहते हो कि मेरा स्थानांतरण हो जाए?” आजकल बात-बात में अधिकारियों के ख़िलाफ़ धरना-प्रदर्शन भी होता रहता है, जिसमें कई अधिकारियों से तू-तू, मैं-मैं और हाथापाई की भी नौबत आ जाती है। जाति देखकर पोस्टिंग भी होती है और तो और उनका मूल्यांकन भी ग़लत होता है। वर्कप्लेस यदि अच्छा नहीं होता, तो कोई भी अधिकारी अपने बाल-बच्चों और परिवार के साथ वहाँ नहीं रहना चाहता; क्योंकि पूर्व में कई अधिकारियों की हत्याएँ भी हो चुकी हैं। यही कारण है कि अधिकारी पास के शहरों में अपने परिवार को रखकर अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं। कभी-कभी तो देर होने की वजह से वे कूदते-फ़ांदते, हाँफते हुए दफ़्तर पहुँचते हैं। साथियों! एक जनपद में लगभग सौ-सवा सौ दफ़्तर और तीसों विभाग होते हैं, जिनमें अधिकारियों की तैनाती होती है। जिन विभागों में अधिकारी नहीं भी होते, तो भी उस विभाग का प्रभार (चार्ज) किसी न किसी अधिकारी के पास होता ही है। अधिकारियों में कोई प्रथम श्रेणी, तो कोई द्वितीय श्रेणी का अधिकारी होता है। कोई केंद्रीय सेवा का, तो कोई राज्य सेवा का अधिकारी होता है। कुछ प्रमुख विभाग जिनमें अधिकारियों की तैनाती होती है, वे हैं— राजस्व, विकास, चिकित्सा, पुलिस, शिक्षा, उद्योग, परिवहन, विद्युत, लोक निर्माण विभाग (PWD), अभियांत्रिकी, बैंक, महिला एवं बाल विकास, राजमार्ग, नगर विकास, सूचना, समाज कल्याण, आपूर्ति, कृषि, वन, पशुपालन विभाग आदि। अधिकारी ही अपने विभाग व कार्यालय की उपलब्धियों और अनुपलब्धियों का ज़िम्मेदार होता है। अधिकारी के रूप में उसे जिले में विभागीय कार्यों के साथ-साथ बाढ़ ड्यूटी, मेला ड्यूटी, चुनावी ड्यूटी, दंगों के नियंत्रण में ड्यूटी, टिड्डियों के अकस्मात आक्रमण की ड्यूटी और अनेकानेक कार्यों में लगाया जाता है व उन्हें ज़िम्मेदार बनाया जाता है। ज़िले में मुख्य रूप से ज़िलाधिकारी होता है, जो ज़िले के अधिकारियों का कंट्रोलिंग ऑफिसर होता है और जनपद की कानून-व्यवस्था को देखता है; जिसके सहयोग के लिए पुलिस आयुक्त या पुलिस अधीक्षक (SP) और तमाम उच्च अधिकारी होते हैं, जो अपना-अपना भरपूर सहयोग देते हैं तथा विकास व व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने में ज़िलाधिकारी के आदेशों का पालन करते हैं। जैसे मुख्य विकास अधिकारी (CDO) विकास हेतु उत्तरदायी होता है, ठीक उसी प्रकार अन्य अधिकारीगण भी। हाँ, तो बात हो रही थी— “अधिकारी होना: मज़ा भी और सज़ा भी।” तो आइए देखें कैसे अधिकारी होना मज़ा और सज़ा दोनों होता है। अधिकारी बनने पर जहाँ एक ओर ज़िम्मेदारियाँ आती हैं, वहीं कई अन्य परेशानियों से भी रूबरू होना पड़ता है। लेकिन यह भी सच है कि जिस टेबल पर आदमी बैठता है, वही काम सिखाती भी है— “Table teaches the work.” सबसे पहले तो अधिकारी बनने से अधिकारिता आती है, ऐसे में एक अधिकारी को धीर, वीर और गंभीर होना चाहिए। वाणी पर नियंत्रण रखना और अनावश्यक वार्ता-विवाद से सदैव बचना चाहिए। अधिकारी को कहीं भी चट्टी-चौराहों पर खाना-पीना नहीं चाहिए और न ही किसी अनजान व्यक्ति के वाहन में बैठना चाहिए। क्यों नहीं बैठना चाहिए? यह आगे इस लेख में स्पष्ट हो जाएगा। आपका चपरासी है, यदि कुछ खाने की इच्छा भी हो, तो अपने पास ही खाद्य सामग्री मँगवा लेनी चाहिए। यदि आप अधिकारी हैं तो— “You have to behave like an officer.” एक अधिकारी का रुतबा लोगों में तभी भरपूर कायम होता है, जब उसकी सोच ईमानदार व मानवीय हो और वह नियमानुसार त्वरित कार्रवाई करने की कोशिश करता हो। एक अधिकारी को जो काम नियमानुसार न होने लायक हो, उसे नहीं करना चाहिए; अन्यथा ग़लत काम पर ही अधिकारी फँसता है और उसे ब्लैकमेल किया जाता है। मित्रों! अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आज कुछ अधिकारियों ने अपनी ज़मीर बेच दी है या उसे गिरवी रख दिया है, सिर्फ़ इसलिए कि मलाईदार पद से न हटना पड़े और अच्छे जनपद व कमाईदार विभाग से रुख़सत न होना पड़े। मित्रों! जिस दिन अधिकारी इन सब चीज़ों की परवाह किए बिना अपनी सेवाएँ देना शुरू कर देंगे, सच मानिए कायाकल्प अवश्यंभावी होगा; लेकिन आज के नैतिक पतन के माहौल में यह असंभव नहीं, तो कठिन अवश्य दिखता है। शासकीय व्यवस्था में एक अधिकारी (जो प्रथम श्रेणी का है या द्वितीय श्रेणी का) उसे प्रतिदिन उपस्थिति पंजिका में दस्तख़त नहीं करने पड़ते; वह केवल उसका अवलोकन करता है। लेकिन उसे अपने मुख्यालय पर हमेशा उपलब्ध रहना होता है। यदि वह मुख्यालय छोड़ता है, तो उसे सक्षम अधिकारी या ज़िलाधिकारी से अनुमति लेकर ही बाहर जाना पड़ता है। एक बार एक अधिकारी प्रायः रात में मुख्यालय छोड़कर समीप के ज़िले में चले जाया करते थे। एक दिन उनकी कार एक ट्रक से जा भिड़ी और उनको गंभीर चोटें आईं, तो सवाल उठा कि आप किसकी अनुमति से अपना मुख्यालय छोड़कर गए थे? इस कारण उनका चिकित्सा-प्रतिपूर्ति का दावा काफ़ी दिनों तक अटका रहा। एक बार एक अधिकारी अपने गाँव शासकीय वाहन से गए और रात में उनके पड़ोसियों द्वारा उनका वाहन ग़ायब कर दिया गया। वे भी उस मामले में बुरी तरह फँस गए, उनके वेतन से वाहन का पूरा मूल्य वसूला गया और उनकी पदोन्नति भी बाधित हुई। एक बार एक अधिकारी की ड्यूटी चुनाव में लगी थी। नासमझी में उन्होंने एक उम्मीदवार को अपने वाहन पर बैठा लिया। उस उम्मीदवार के विरोधी ने अधिकारी महोदय की शिकायत ज़िलाधिकारी से कर दी कि वह एक ख़ास अभ्यर्थी का प्रचार कर रहे थे। ज़िलाधिकारी ने उन्हें तत्काल प्रभाव से दंड देकर हटा दिया। अधिकारियों द्वारा अपने वाहनों का दुरुपयोग तो किया ही जाता है। एक बार एक अधिकारी महोदय अपने व्यक्तिगत कार्य से किसी महानगर को जा रहे थे, तो उनके वाहन से एक व्यक्ति का एक्सीडेंट हो गया। वे उस मामले में बुरी तरह फँस गए और उन्हें वर्षों मुकदमा लड़ना पड़ा। एक बार एक अधिकारी महोदय अपने सरकारी वाहन से वाराणसी आए। जब वे लंका (BHU) से होकर गुज़र रहे थे, तो छात्रों के आंदोलन में फँस गए। छात्रों ने उनके वाहन को क्षतिग्रस्त कर दिया और उसे फूँकने ही जा रहे थे कि उनके मुख से निकल गया— “भैया! मैं भी इसी विश्वविद्यालय का छात्र रहा हूँ।” तब जाकर छात्रों ने उनके वाहन को छोड़ा। ज़िले के एक प्रथम श्रेणी के अधिकारी की ड्यूटी एक छात्र आंदोलन को रोकने में लगाई गई थी। उनके साथ पुलिस के सर्किल ऑफिसर भी थे, परंतु छात्रों ने अधिकारी महोदय के वाहन को आग के हवाले कर दिया। फिर भी अधिकारी अपने शासकीय वाहनों के दुरुपयोग से बाज़ नहीं आते और आए दिन किसी न किसी समस्या में फँसते जाते हैं। कभी-कभी तो उन्हें निलंबन भी झेलना पड़ता है और कभी उनके वेतन से वसूली व वेतन-वृद्धि भी रुक जाती है, जिससे उनका पूरा करियर बर्बाद हो जाता है। मित्रों! कुछ अराजक तत्व ऐसे भी होते हैं जो सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत सूचनाएँ माँगते हैं और जब अधिकारी समय से सूचना नहीं दे पाते, तो संबंधित राज्य के सूचना आयुक्त उनके वेतन से ₹25,000 कटवाने का आदेश संबंधित अधिकारी के ज़िले के ज़िलाधिकारी को भेज देते हैं। इससे सूचना माँगने वाले हर्षातिरेक में मदमस्त होकर उस अधिकारी की लानत-मलामत करते दिख जाते हैं। मित्रों! अभी हम अधिकारियों की कुछ परेशानियों का ज़िक्र कर रहे थे, अब आइए उनके रुतबे को भी देखते हैं। एक अधिकारी का महत्व उसके ड्राइवर, वाहन, चपरासी, नौकर-चाकर, सरकारी क्वार्टर और उसके साथ चलने वाले गार्ड से ही होता है। जब एक अधिकारी अपने कार्यालय शासकीय वाहन से जाता है, तो उसकी शान-ओ-शौकत देखते ही बनती है। जब उसका वाहन रुकता है, झट से चपरासी वाहन का दरवाज़ा खोलता है, गार्ड मोर्चा संभालता है और साहब की फ़ाइलें व ज़रूरी कागजात लेकर उनके पीछे-पीछे चलता है, तो मानो एक राजशाही ठाट ही नज़र आती है; और अधिकारी यह सोचकर फूले नहीं समाते। भाई! अधिकारी तो अधिकारी ही होता है, वह क्यों न अधिकारिता जताए और अपने पद पर क्यों न गर्व व गर्वानुभूति करे! पाठकों! मैं आप सभी को बताना चाहता हूँ कि किसी भी व्यक्ति का चाल, चरित्र और व्यवहार छिपा नहीं रहता; वह वातावरण में गंध की भाँति फैल जाता है और पब्लिक बहुत बड़ी जज होती है, जो अधिकारियों को पहचान लेती है। पब्लिक अच्छे अधिकारियों को रोकने हेतु आंदोलन भी करती है और बुरों के ख़िलाफ़ आवाज़ भी उठाती है। यहाँ मैं अंग्रेज़ी के एक विद्वान के कथन को उद्धृत करना चाहूँगा: “You can fool all the people some of the time, and some of the people all of the time, but you cannot fool all the people all of the time.” कभी-कभी अच्छे अधिकारी सही काम करने में कठिनाई महसूस करते हैं और तनावग्रस्त रहने लगते हैं, जब उन्हें ईमानदारी से काम नहीं करने दिया जाता। इसी कारण बहुतेरे अधिकारी असमय ही कई रोगों के शिकार हो जाते हैं। साथियों! अंत में मैं आप सभी को बताना चाहूँगा कि हम सभी को अपना अंतःकरण पवित्र रखकर कार्य करना चाहिए, क्योंकि: “Mother Nature never spares anyone; it gives a balancing effect to all deeds to all concerned.” लेखक: कई राज्यस्तरीय सम्मानों से विभूषित, कई पुस्तकों के रचयिता, वार्ताकार, साहित्यकार एवं शिक्षाविद हैं तथा पूर्व में प्रथम श्रेणी के अधिकारी रह चुके हैं। Post navigation नोबेल की चाह, युद्ध की राह