युद्ध की आग में झुलसती मानवता व डगमगाती वैश्विक अर्थव्यवस्था से मुक्त होने की आज सबसे ज्यादा जरूरत है। अशोक कुमार द्विवेदी वरिष्ठ पत्रकार व समीक्षक विश्व राजनीति में किसी भी नेता का सबसे बड़ा परिचय उसके भाषण से नहीं बल्कि निर्णय होते हैं। शांति की घोषणा करना तो सरल है किंतु उसे स्थायी बनाना अत्यंत कठिन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से स्वयं को नोबेल शांति पुरस्कार का स्वाभाविक दावेदार बताते रहे हैं। अनेक अवसरों पर उन्होंने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि विश्व के अनेक संघर्षों को शांत कराने में उनकी भूमिका रही है। किंतु आज परिस्थितियाँ एक असहज प्रश्न खड़ा करती हैं कि यदि युद्धविराम कुछ ही दिनों में टूट जाए, मिसाइलें फिर आसमान चीरने लगें व बारूद की गंध कूटनीति पर भारी पड़ जाए तो क्या केवल समझौते की घोषणा किसी नेता को ष्पीसमेकरष् सिद्ध कर सकती है?ईरान और अमेरिका के बीच फिर बढ़ते सैन्य तनाव ने विश्व समुदाय की चिंताओं को कई गुना बढ़ा दिया है। हाल के दिनों में अमेरिका की सैन्य कार्रवाई और उसके जवाब में ईरान की ओर से दोबारा शुरू हुए हमलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम एशिया अब भी विस्फोटक मोड़ पर खड़ा है। युद्धविराम की जो उम्मीद जगाई गई थी । वह अधिक समय तक टिक नहीं सकी। इससे यह धारणा भी कमजोर हुई कि केवल शक्ति प्रदर्शन से स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है।इस पूरे घटनाक्रम में ईरान की भूमिका भी आलोचना से परे नहीं है। अपनी सामरिक जिद, आक्रामक प्रतिक्रिया व टकरावपूर्ण रुख ने उसने समाधान की संभावनाओं को और कठिन बनाया है। होर्मुझ स्ट्रेथ पर ईरान का अड़ियल रवैया कहीं से भी स्वीकार्य नहीं है। किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता व सुरक्षा महत्वपूर्ण है । किंतु जब प्रतिशोध संवाद पर भारी पड़ने लगे, तब उसका दुष्परिणाम केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहता । बल्कि पूरा विश्व उसकी कीमत चुकाता है। हठधर्मिता चाहे किसी भी पक्ष की हो, अंततः वह शांति की सबसे बड़ी शत्रु बन जाती है।अमेरिका स्वयं को विश्व व्यवस्था का नेतृत्वकर्ता मानता है। इसलिए उससे अपेक्षा भी अधिक होती है। यदि वही महाशक्ति बार-बार सैन्य विकल्पों को प्राथमिकता देती दिखाई दे तो वैश्विक विश्वास कमजोर पड़ता है। विश्व को ऐसी महाशक्ति चाहिए जो संघर्ष को बढ़ाने के बजाय उसे रोकने की निर्णायक क्षमता दिखाए। केवल सैन्य शक्ति से भय पैदा किया जा सकता है स्थायी शांति नहीं।सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस संघर्ष की कीमत केवल युद्धरत देश नहीं चुका रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी मार पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ रही है। पश्चिम एशिया ऊर्जा आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है। जैसे ही युद्ध की आशंका बढ़ती है, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें उछाल मारने लगती हैं। तेल महंगा होने का सीधा असर परिवहन, उद्योग, कृषि, बिजली उत्पादन व रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं पर पड़ता है। महँगाई बढ़ती है, उत्पादन लागत बढ़ती है और वैश्विक आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ जाती है।भारत भी इस संकट से अछूता नहीं रह सकता। देश अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल लगातार महंगा होता है, तो इसका प्रभाव पेट्रोल-डीजल की कीमतों, मालभाड़े, खाद्य पदार्थों, औद्योगिक उत्पादन और आम नागरिक की जेब तक पहुँचता है। सरकारें वित्तीय संतुलन बनाने में उलझती हैं और विकास योजनाओं पर भी दबाव बढ़ता है। पश्चिम एशिया की जंग का धुआँ भारत के घरों तक आर्थिक बोझ के रूप में पहुँचता है।यह केवल अर्थव्यवस्था का संकट नहीं, बल्कि मानवता की भी परीक्षा है। हर मिसाइल के पीछे किसी परिवार का उजड़ना, हर बम के पीछे किसी बच्चे का भविष्य समाप्त होना और हर युद्ध के पीछे लाखों लोगों का विस्थापन छिपा होता है। आधुनिक सभ्यता यदि आज भी समस्याओं का समाधान बमों और मिसाइलों में खोज रही है तो यह विज्ञान की नहीं, मानव विवेक की पराजय है। युद्ध किसी की स्थायी विजय नहीं लिखता । युद्ध केवल पीड़ा, घृणा व अस्थिरता की विरासत छोड़ता है।नोबेल शांति पुरस्कार उन लोगों को दिया जाता है जिन्होंने मानवता को युद्ध से बचाने, देशों के बीच विश्वास बढ़ाने और स्थायी शांति स्थापित करने का वास्तविक प्रयास किया हो। यह सम्मान आत्मघोषणा से नहीं, विश्व समुदाय के विश्वास से मिलता है। यदि किसी नेता के कार्यकाल में संघर्ष बार-बार लौट आएँ, युद्धविराम बार-बार टूटे और विश्व अस्थिरता की ओर बढ़ता जाए, तो स्वाभाविक है कि उसके शांति प्रयासों पर प्रश्न उठेंगे।विश्व पहले ही आर्थिक मंदी, जलवायु संकट और अनेक मानवीय चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में युद्ध की नई लपटें पूरी मानवता के भविष्य को संकट में डाल रही हैं। डोनाल्ड ट्रंप इतिहास में शांति निर्माता के रूप में याद किए जाने की चाहत रखते हैं तो उन्हें युद्धविराम की घोषणा से आगे बढ़कर उसे स्थायी बनाने का साहस और धैर्य दिखाना होगा। वहीं ईरान को भी प्रतिशोध की राजनीति से ऊपर उठकर संवाद का मार्ग अपनाना होगा। क्योंकि इतिहास में सम्मान उन राष्ट्रों और नेताओं को मिलता है जो युद्ध जीतते नहीं, बल्कि युद्ध होने से रोक देते हैं। नोबेल का मार्ग बारूद से नहीं, विश्वास से होकर गुजरता है। Post navigation प्रधानमंत्री मोदी के भारत के 5एफ विज़न को बुनता टेक्स 2026