अनिवार्य प्रश्न। संवाद। दिल्ली-एनसीआर। नीट पेपर लीक के खिलाफ दिल्ली में बीते करीब डेढ़ महीने से ज्यादा समय से चल रहे प्रदर्शनों में शनिवार को बड़ा मोड़ आया। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने युवाओं की मांग को मानते हुए अपने पद से इस्तीफे का एलान कर दिया। इतना ही नहीं उनके इस फैसले के बाद युवाओं के आंदोलन का नेतृत्व कर रही कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने केंद्र सरकार के साथ बैठक की। इसमें उसकी सभी तीन मांगों को मान लिया गया, जिसके बाद सीजेपी ने प्रदर्शनकारियों को धन्यवाद दिया और जंतर-मंतर से जाने की अपील की। इस पूरे घटनाक्रम को दुनियाभर में प्रमुखता से कवर किया गया। आइये जानते हैं कि अमेरिका से लेकर ब्रिटेन तक किस संस्थान ने इस पर क्या कहा है… सीएनएनअमेरिकी मीडिया संस्थान सीएनएन ने इन प्रदर्शनों पर विस्तृत रिपोर्टिंग करते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को युवा प्रदर्शनकारियों की एक बड़ी जीत और मोदी सरकार के लिए एक श्दुर्लभ हारश् करार दिया। सीएनएन ने इन प्रदर्शनों को केवल शिक्षा व्यवस्था या पेपर लीक तक सीमित न मानकर इसे भारत के युवाओं में व्याप्त बेरोजगारी, वित्तीय बोझ और राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ एक बड़े आक्रोश के रूप में पेश किया है। सीएनएन के मुताबिक, कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में हो रहे ये लगातार प्रदर्शन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के लिए एक दुर्लभ और बढ़ती हुई चुनौती पेश कर रहे थे। नेटवर्क का कहना है कि अपने तीसरे कार्यकाल वाले पीएम मोदी आमतौर पर विरोध प्रदर्शनों से नहीं झुकते हैं, और आलोचक लंबे समय से उनकी सरकार पर असंतोष और विपक्ष को कुचलने का आरोप लगाते रहे हैं। सीएनएन की रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रदर्शनकारी युवा उन मध्यम वर्गीय परिवारों से आते हैं, जिन्होंने पहले मोदी की पार्टी- भाजपा को वोट दिया था, लेकिन वे आधुनिक भारत में अवसरों की कमी के कारण अब काफी गुस्से में हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि संसद की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की ओर से लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल ने युवाओं के गुस्से को और भड़का दिया और आंदोलन को व्यापक समर्थन दिलाया। द गार्डियनद गार्डियन के विश्लेषण के मुताबिक, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भारत के युवा आंदोलन के लिए एक बड़ी जीत के तौर पर आया है। इसने नरेंद्र मोदी की सरकार के सामने एक अभूतपूर्व चुनौती पेश की। वेबसाइट ने इस बात पर विशेष जोर दिया है कि मोदी के 12 साल के शासनकाल में यह पहली बार है जब उनके किसी सबसे वफादार और अहम मंत्री को जनता के दबाव में आकर इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा है। विश्लेषण में बताया गया है कि प्रधान ने अपने इस्तीफे का कारण यह बताया कि वह नहीं चाहते थे कि राष्ट्रविरोधी ताकतें इस स्थिति का फायदा उठाएं। गार्डियन का मानना है कि महीनों से चल रहे इस गतिरोध में सरकार पहले युवाओं की अनदेखी कर रही थी, लेकिन जब आंदोलन पूरे देश में फैल गया और लाखों लोग सड़कों पर उतर आए, तो सरकार को घुटने टेकने पड़े। यह इस्तीफा केवल एक व्यक्ति का पद छोड़ना नहीं है, बल्कि यह मोदी सरकार की अजेय छवि को लगा एक बड़ा झटका है, जिसने लोगों के मन से सरकार का डर खत्म कर दिया है। एसोसिएटेड प्रेसअमेरिकी न्यूज एजेंसी- एसोसिएटेड प्रेस (एपी) ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की ओर से हाल के वर्षों में सार्वजनिक असंतोष के सामने दी गई पहली सबसे बड़ी रियायत कहा है। एपी के मुताबिक, 2021 के किसान आंदोलन के अपवाद को छोड़कर, मोदी के 12 साल से अधिक के कार्यकाल में सरकार ने शायद ही कभी जनता के लगातार दबाव के सामने घुटने टेके हैं । एजेंसी ने कहा कि प्रधान का इस्तीफा उस व्यापक जन-आक्रोश का परिणाम था जो परीक्षा में धांधली से शुरू होकर बेरोजगारी और सरकार की जवाबदेही जैसे बड़े मुद्दों तक फैल गया था। विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि विपक्षी दलों ने इस इस्तीफे को सरकार पर लगातार बनाए गए सार्वजनिक दबाव की जीत के रूप में देखा है। एपी ने इसे केवल एक शिक्षा मंत्री की विदाई नहीं, बल्कि युवाओं के नेतृत्व वाले उस कॉकरोच आंदोलन की एक ऐतिहासिक जीत मानता है जिसने भारत की सड़कों पर एक नई राजनीतिक चेतना को जन्म दिया है। अल जजीराकतर के मीडिया संस्थान- अल जजीरा ने प्रधान के इस्तीफे का विश्लेषण करते हुए उनके कद्दावर राजनीतिक कद और इस घटना के व्यापक असर का जिक्र किया है। नेटवर्क ने बताया है कि 57 वर्षीय धर्मेंद्र प्रधान 2014 से ही मोदी सरकार में एक प्रमुख मंत्री रहे हैं और उन्हें भविष्य के भाजपा अध्यक्ष के रूप में भी देखा जा रहा था। ऐसे वरिष्ठ नेता का इस्तीफा इस बात का प्रमाण है कि कॉकरोच आंदोलन का दबाव कितना प्रचंड था। अल-जजीरा की रिपोर्ट में इसे भ्रष्टाचार, नौकरियों की कमी और परीक्षा प्रणाली की खामियों के खिलाफ भारत के युवाओं की हताशा से उपजे एक बड़े जन-विद्रोह की निर्णायक सफलता करार दिया गया। रॉयटर्सब्रिटेन की न्यूज एजेंसी- रॉयटर्स ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का एक ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ में विश्लेषण के तौर पर पेश किया। समाचार एजेंसी के मुताबिक, प्रधान का इस्तीफा युवाओं के लिए एक बड़ी जीत के तौर पर आया है। इसने प्रधानमंत्री मोदी के लिए एक बहुत ही गंभीर चुनौती खड़ी कर दी थी। रॉयटर्स ने एक बहुत ही अहम ऐतिहासिक तथ्य पर जोर दिया है कि 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से किसी बड़े घोटाले या जन-दबाव के कारण इस्तीफा देने वाले धर्मेंद्र प्रधान केवल दूसरे मंत्री हैं। इससे पहले 2018 में मीटू (रुडमज्वव) आंदोलन के दौरान एमजे. अकबर ने इस्तीफा दिया था। इसके अलावा, रॉयटर्स ने बताया है कि सड़कों पर अभूतपूर्व प्रदर्शन और पुलिस की ओर से आंसू गैस के इस्तेमाल ने जनता के गुस्से को इतना बढ़ा दिया था कि सरकार के पास इस भारी दबाव के आगे झुकने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। विपक्षी नेताओं की ओर से संसद की कार्यवाही बाधित करने और युवाओं का समर्थन करने से भी मोदी सरकार पर दबाव बढ़ा। सीएनएन की तरह रॉयटर्स ने भी इसे मोदी सरकार की एक दुर्लभ राजनीतिक हार माना है। न्यूयॉर्क टाइम्सन्यूयॉर्क टाइम्स ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर विस्तृत रिपोर्टिंग करते हुए इसे छात्र आंदोलन की एक बड़ी जीत करार दिया। अखबार ने अपनी रिपोर्ट का शीर्षक दिया है- भारत के शिक्षा मंत्री ने पद छोड़ा, प्रदर्शनकारियों को मिली जीत। अखबार के मुताबिक, इस युवा आंदोलन का तेजी से उभार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्ता के लिए हाल के वर्षों में सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बन गया था। एनवाईटी लिखता है कि प्रधान का इस्तीफा हफ्तों के भारी सार्वजनिक दबाव के आगे झुकना है, जो दिल्ली से लेकर मुंबई, कोलकाता और चेन्नई तक देशव्यापी सड़क विरोध प्रदर्शनों के रूप में सामने आया।एनवाईटी की ओर से स्पष्ट किया गया है कि प्रधान को हटाने की मांग ने पीएम मोदी को अपने वफादार समर्थकों, जिनमें प्रधान एक प्रमुख नेता हैं और देश की 40ः आबादी वाले युवाओं को शांत करने की जरूरत के बीच संतुलन बनाने के लिए मजबूर कर दिया। अखबार ने इस बात पर जोर दिया कि पेपर लीक की घटना तो केवल एक चिंगारी थी। इसके पीछे का मूल कारण सरकार की जवाबदेही की कमी और भयानक बेरोजगारी है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने आंकड़े देते हुए बताया है कि भारत में 15 से 25 वर्ष की आयु के लगभग 40ः स्नातक बेरोजगार हैं, और छात्रों में आत्महत्या की दर भी तेजी से बढ़ रही है। अखबार के मुताबिक, छात्रों की यह जीत उन्हें अपने अन्य बड़े और व्यापक एजेंडे, जैसे न्यायिक सुधार और संसद में महिलाओं के लिए आरक्षण को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित कर सकती है। एजेंसी फ्रांस प्रेस (एएफपी)फ्रांस की न्यूज एजेंसी एएफपी की रिपोर्ट में नीट परीक्षा में हुई धांधली को लेकर युवाओं के भारी विरोध और उन्हें पद से हटाने की मांग का जिक्र किया गया। एएफपी ने इस आंदोलन के राजनीतिक प्रभाव का जिक्र करते हुए कहा है कि यह कॉकरोच आंदोलन 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दोबारा सत्ता में आने के बाद से उनकी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गया था। इसमें यह भी कहा गया कि विपक्षी नेता राहुल गांधी ने प्रदर्शनकारियों का खुलकर समर्थन किया और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को एक बड़ा कदम करार दिया। बीबीसीबीबीसी के विश्लेषण के मुताबिक, युवाओं के इस आंदोलन ने एक ऐसा लक्ष्य हासिल किया है जिसे भारत के विपक्षी दल भी पिछले 12 वर्षों में शायद ही कभी हासिल कर पाए हों। इसे एक बेहद दुर्लभ क्षण बताया गया, जहां लगातार बनाए गए जन-दबाव ने प्रधानमंत्री मोदी जैसी शक्तिशाली सरकार को एक बड़ी रियायत देने और अपना रुख बदलने पर मजबूर कर दिया। बीबीसी ने कहा है कि 2021 के किसान आंदोलन के उलट, इस कॉकरोच आंदोलन ने धर्म, जाति या किसी विशिष्ट समूह की सीमाओं को तोड़ते हुए भारत के एक बड़े मध्यम वर्ग को गहराई से प्रभावित किया। यह आंदोलन पूरी तरह से ऑर्गेनिक था, जिसके कारण विरोध प्रदर्शनों से निपटने में हमेशा आश्वस्त रहने वाली मोदी सरकार इस बार काफी घबराई हुई नजर आई। 12 साल में पहली बार ऐसा लगा कि पीएम मोदी समझ नहीं पा रहे थे कि क्या किया जाए। विश्लेषण के मुताबिक, महीनों के गतिरोध और अनसुनी के बाद जब सोमवार को प्रदर्शनकारियों पर पुलिस का क्रूर लाठीचार्ज हुआ, तो इस घटना ने जनता के गुस्से को चरम पर पहुंचा दिया। इसी घटना ने बाजी पूरी तरह से सीजेपी के पक्ष में पलट दी, जिसके चलते शिक्षा मंत्री को आखिरकार इस्तीफा देना पड़ा। अंत में ब्रिटेन के इस संस्थान ने एक अहम सवाल उठाया है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी इस इस्तीफे के बाद अपना खोया हुआ राजनीतिक दबदबा और उन लोगों का विश्वास वापस पा सकेंगे, जो कभी उनके पक्के समर्थक थे लेकिन सरकार के इस पूरे रवैये से बेहद निराश हुए हैं। Post navigation राष्ट्रपति ने मंजूर किया प्रधान का इस्तीफा, प्रह्लाद जोशी को मिला शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार संत शिरोमणि गुरु रविदास जी की 650वीं जयंती पर समरसता संकल्प अभियान की कार्यशाला एवं कार्ययोजना बैठक महानगर कार्यालय गुलाब बाग में संपन्न