In the first phase of ‘Prabodh Path’, intellectuals visited the site of Kabir’s birth and the village of the people’s poet, Dhumil.In the first phase of ‘Prabodh Path’, intellectuals visited the site of Kabir’s birth and the village of the people’s poet, Dhumil.

अनिवार्य प्रश्न। ब्यूरो संवाद।

‘प्रबोध पथ’ खुली पाठशाला है, जहाँ संवाद ही अध्ययन है और जिज्ञासा ही दिशा कृ पं० छतिश द्विवेदी ‘कुण्ठित’

वाराणसी। साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था ‘उद्गार’ एवं ‘स्याही प्रकाशन’, ‘काशी मनीषी महासभा’, ‘जनसेना’, ‘पीपल लगाओ आंदोलन’ एवं ‘लगाव’ के संयुक्त तत्वावधान में ज्ञान, चेतना और लोकपरंपरा के अन्वेषण हेतु परिकल्पित ‘प्रबोध पथ’ यात्रा के प्रथम चरण का विधिवत शुभारंभ हुआ। इस यात्रा के अंतर्गत काशी और आसपास के साहित्यकारों, विचारकों एवं प्रबुद्धजनों के एक प्रतिनिधिमंडल ने संत कबीर की प्राकट्य स्थली लहरतारा तथा जनकवि सुदामा प्रसाद ‘धूमिल’ के मूल जन्मस्थान ग्राम खेवली का सघन दौरा किया।

प्रतिनिधिमंडल ने दोनों ही महत्वपूर्ण साहित्यिक एवं सांस्कृतिक पड़ावों पर पहुँचकर संत शिरोमणि कबीरदास एवं जनकवि धूमिल की स्मृतियों को नमन किया तथा उनके स्मारक एवं संबंधित स्थलों का अध्ययन किया। यात्रा का उद्देश्य केवल स्थान-दर्शन तक सीमित न रहकर भारतीय ज्ञान-परंपरा, संत संस्कृति, लोकजीवन तथा साहित्य के अंतर्संबंधों को गहराई से समझना और स्थानीय जानकारों एवं समाज के साथ जीवंत संवाद स्थापित करना रहा।

कबीर प्राकट्य स्थली के भ्रमण के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने कबीर मठ के महंत गोविंद दास शास्त्री जी से भेंट की और संत कबीर के जीवन, विचार, साहित्य तथा उनकी परंपरा से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर संवाद किया। इस अवसर पर प्रकाशक पं० छतिश द्विवेदी ‘कुण्ठित’ ने महंत जी को साहित्यिक काव्य-पुस्तकों का एक सेट भेंट किया। इसके प्रत्युत्तर में महंत गोविंद दास शास्त्री जी ने उपस्थित सभी साहित्यकारों को अपना ग्रंथ भेंट किया। पुस्तकों के इस आदान-प्रदान को साहित्य और संत परंपरा के बीच संवाद की एक आत्मीय कड़ी के रूप में देखा गया। इस कार्यक्रम में महन्थ जी के शिष्य अशोक राय जी (रोठरी क्लब कबीर) से भी विशेष भेंट हुई।

यात्रा के अगले पड़ाव में प्रतिनिधिमंडल जनकवि सुदामा प्रसाद ‘धूमिल’ के मूल जन्मस्थान ग्राम खेवली, वाराणसी पहुँचा। वहाँ साहित्यकारों ने धूमिल की जन्मभूमि, उनके स्मारक स्थल तथा गाँव से जुड़े विभिन्न स्थलों का भ्रमण कर उनके जीवन और साहित्यिक व्यक्तित्व के संबंध में जानकारी प्राप्त की। इस दौरान गाँव के अशोक पांडेय ‘पप्पू’ एवं दुर्गा प्रसाद पांडेय से धूमिल के जीवन, उनके साहित्य और तत्कालीन सामाजिक परिवेश को लेकर विस्तार से चर्चा हुई। स्थानीय लोगों से हुए इस संवाद के माध्यम से धूमिल के साहित्य को उनकी जन्मभूमि और लोकजीवन के संदर्भ में समझने का अवसर मिला।

इस अवसर पर जनकवि धूमिल के बड़े पुत्र रत्न शंकर पांडेय से भी दूरभाष के माध्यम से बातचीत की गई। वर्तमान में मुंबई में रह रहे रत्न शंकर पांडेय से धूमिल जी के जीवन, पारिवारिक संदर्भों और साहित्यिक यात्रा से जुड़े विषयों पर चर्चा हुई। इस संवाद ने धूमिल के रचनात्मक व्यक्तित्व को पारिवारिक स्मृतियों और उनकी जन्मभूमि के संदर्भ से जोड़ते हुए यात्रा के अध्ययन पक्ष को और समृद्ध किया।

यात्रा के दौरान दोनों ही स्थलों पर विचार-संवाद का आयोजन किया गया, जिसका मुख्य विषय “संत कबीर से धूमिल तक की यात्रा के मायने” रहा। इस अवसर पर विचार व्यक्त करते हुए पं० छतिश द्विवेदी ‘कुण्ठित’ ने कहा कि ‘प्रबोध पथ’ कोई औपचारिक पर्यटन नहीं, बल्कि हमारी वैचारिक जड़ों और लोकजीवन से पुनः साक्षात्कार का एक सार्थक प्रयास है। उन्होंने कहा कि 15वीं सदी में कबीर ने जिस पाखंड-विरोधी, बेबाक और लोकधर्मी चेतना की नींव रखी थी, वही तेवर और जनसरोकार 20वीं सदी में कवि धूमिल की कविताओं में संसद से सड़क तक गूंजता दिखाई देता है। यह यात्रा हमारे लिए एक खुली पाठशाला है, जहाँ संवाद ही अध्ययन है और जिज्ञासा ही दिशा।

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ० अनिल सिन्हा ‘बहुमुखी’ ने अपने वक्तव्य में कहा कि कबीर से लेकर धूमिल तक की परंपरा वास्तव में जनचेतना के यथार्थ बोध और प्रतिरोध की परंपरा है। जहाँ कबीर ने समाज को पाखंडों से मुक्त कर मानवीय मूल्यों का मार्ग दिखाया, वहीं धूमिल ने स्वतंत्र भारत के आम आदमी की व्यथा और व्यवस्था के अंतर्विरोधों को प्रखर वाणी दी।

इस वैचारिक एवं सांस्कृतिक यात्रा में प्रमुख रूप से पं० छतिश द्विवेदी ‘कुण्ठित’, डॉ० अनिल सिन्हा ‘बहुमुखी’, यात्रा के संयोजक त्रय सुनील कुमार सेठ, दीपक शर्मा ‘नवेंदु’, जी० एल० पटेल ‘अयन’, चंद्रभूषण सिंह, नंदलाल राजभर ‘नंदू’, रामनरेश पाल, रामकृष्ण मिश्रा आदि प्रबुद्ध साहित्यकार, चिंतक एवं सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

आयोजकों ने बताया कि ‘प्रबोध पथ’ की यह श्रृंखला निरंतर जारी रहेगी। आगामी चरणों में पूर्वांचल के अन्य महत्वपूर्ण साहित्यिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं ज्ञानपरक स्थलों की यात्रा कर वहाँ के साहित्य, लोकजीवन, परंपरा और इतिहास से जुड़े लोगों के साथ संवाद स्थापित किया जाएगा। इसका उद्देश्य यात्रा को महज भ्रमण न रखकर अध्ययन, संवाद, अनुभव और ज्ञानार्जन की एक सतत प्रक्रिया के रूप में विकसित करना है।

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