अशोक कुमार द्विवेदी (वरिष्ठ पत्रकार व समीक्षक) जब विवाह के सपने सज रहे हों और उसी रिश्ते में हत्या की साजिश रची जा रही हो, तब यह मान लेना चाहिए कि संकट केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि समाज की नैतिक चेतना का भी है। पुणे के युवा उद्यमी केतन अग्रवाल की हत्या का मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि रिश्तों में पनपते अविश्वास, स्वार्थ और संवेदनहीनता का गंभीर संकेत है। यदि जांच में सामने आए आरोप सही सिद्ध होते हैं, तो यह घटना रिश्तों की पवित्रता पर गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। प्रश्न केवल यह नहीं है कि एक युवक की हत्या क्यों हुई। वास्तविक प्रश्न यह है कि हमारा समाज किस दिशा में बढ़ रहा है? प्रेम, मित्रता, विवाह और पारिवारिक संबंध, जो कभी विश्वास और समर्पण की बुनियाद माने जाते थे, वे आज कई बार छल, स्वार्थ, विश्वासघात और हिंसा की खबरों के साथ क्यों जुड़ते दिखाई दे रहे हैं? बीते कुछ वर्षों में देश ने ऐसे अनेक चर्चित मामले देखे हैं। मेरठ में सौरभ राजपूत हत्याकांड, इंदौर के राजा रघुवंशी की हत्या और दिल्ली का श्रद्धा वालकर हत्याकांड लंबे समय तक राष्ट्रीय चर्चा का विषय बने रहे। प्रत्येक मामले की परिस्थितियाँ अलग थीं, लेकिन इन घटनाओं ने एक साझा चिंता अवश्य पैदा कीकृरिश्तों में भरोसे का लगातार कमजोर होना। यदि किसी संबंध को स्वीकार करना संभव न हो, तो उसे समाप्त किया जा सकता है; किंतु किसी का जीवन समाप्त करना किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता। आज भौतिक सफलता को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लिया गया है। महंगे प्री-वेडिंग शूट, सोशल मीडिया पर दिखावे की संस्कृति और भव्य समारोहों के बीच त्याग, धैर्य, संवाद और समर्पण जैसे जीवन-मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं। बाहरी चमक बढ़ी है, लेकिन भीतर का मनुष्य कई बार अकेला, असुरक्षित और संवेदनहीन होता दिखाई देता है। चिंता की बात यह भी है कि वर्तमान पीढ़ी रिश्ते बनाने में जितनी तेजी दिखाती है, उन्हें तोड़ने में उससे भी अधिक उतावली दिखाई देती है। मतभेद होने पर संवाद की जगह क्रोध, प्रतिशोध और हिंसा ले लेते हैं। जबकि किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी ऊँची इमारतों या भव्य आयोजनों से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि उसके नागरिक अपने रिश्तों को कितनी ईमानदारी, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ निभाते हैं। इसके लिए केवल युवाओं को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। परिवारों का विघटन, अभिभावकों के पास समय का अभाव, नैतिक शिक्षा का कमजोर होता आधार, सोशल मीडिया का अनियंत्रित प्रभाव और त्वरित सफलता की मानसिकता भी इस संकट के प्रमुख कारण हैं। बच्चे बड़े तो हो रहे हैं, लेकिन उनके व्यक्तित्व में संवेदनशीलता और धैर्य का विकास समान गति से नहीं हो पा रहा। कानून की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जघन्य अपराधों में निष्पक्ष, त्वरित और प्रभावी न्याय व्यवस्था समाज का विश्वास मजबूत करती है। जब मुकदमे वर्षों तक लंबित रहते हैं, तब न्याय का संदेश कमजोर पड़ता है और कानून का भय भी कम होता है। इसलिए न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि समय पर होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। फिर भी केवल कानून समाज को नहीं बचा सकता। इसकी शुरुआत परिवार से होगी। घरों में संवाद लौटाना होगा, बच्चों को करियर के साथ चरित्र का संस्कार भी देना होगा। उन्हें यह सिखाना होगा कि किसी रिश्ते से असहमति हो सकती है, उससे अलग हुआ जा सकता है, लेकिन किसी का जीवन छीनने का अधिकार किसी को नहीं है। केतन अग्रवाल प्रकरण समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि समय रहते रिश्तों में विश्वास, नैतिकता और संवेदनशीलता को पुनर्जीवित करने का प्रयास नहीं किया गया, तो आने वाले समय में रिश्तों की औपचारिक चमक भले दिखाई दे, लेकिन उनके भीतर से विश्वास, मानवता और आत्मीयता का प्रकाश धीरे-धीरे बुझता जाएगा। Post navigation पीएम मित्र पार्क के ज़रिए कैसे भारत के टेक्सटाइल क्षेत्र की बदल रही है तस्वीर