The cost of the disarrayed system is no longer hidden.The cost of the disarrayed system is no longer hidden.
  • डॉ. गिरधर जे. ज्ञानी

जानकारी के एक जगह से दूसरी जगह सही तरीके से न पहुंचने के कारण अस्पतालों को लंबे समय से डॉक्टरों के समय की बर्बादी और अटके हुए बीमा दावों के रूप में नुकसान उठाना पड़ रहा है। अब जरूरत ऐसी डिजिटल व्यवस्थाएं बनाने की है, जो एक-दूसरे के साथ आसानी से जानकारी साझा कर सकें।

भारत के कई हिस्सों में आज भी एक डॉक्टर से दूसरे डॉक्टर तक मरीज की जानकारी पहुंचाने का मुख्य जरिया खुद मरीज ही है। वह हर बार अपनी पुरानी मेडिकल रिपोर्ट लेकर जाती है- कागजों की फाइल, मोबाइल में जांच की तस्वीरें या फिर सिर्फ अपनी याददाश्त के भरोसे। इलाज के हर चरण में नई जानकारी तैयार होती है, लेकिन अक्सर वह अगले डॉक्टर या अस्पताल तक नहीं पहुंच पाती।
अस्पतालों के लिए इस कमी को दूर करना लंबे समय तक प्राथमिकता नहीं रहा। जब स्वास्थ्य सेवाओं को डिजिटल बनाने की बात हुई, तो मुख्य सवाल यही रहा कि इसमें कितना खर्च आएगा और अस्पतालों को अपनी व्यवस्था में कितना बदलाव करना पड़ेगा।
स्वास्थ्य क्षेत्र में कोई नई डिजिटल व्यवस्था एक सप्ताहांत में लागू नहीं की जा सकती। अस्पतालों में वर्षों पुराने सॉफ्टवेयर, अलग-अलग तरह की काम करने की प्रक्रियाएं और डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल का अलग-अलग स्तर है। छोटे अस्पतालों के लिए तकनीक पर खर्च किया गया हर रुपया बिस्तरों, उपकरणों और कर्मचारियों पर होने वाले खर्च से जुड़ा होता है। इसलिए हमेशा यह सवाल रहा कि क्या नई व्यवस्था वास्तव में ऐसी समस्या का समाधान करेगी, जिसका समाधान जरूरी है।
अब सवाल बदल गया है। ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि मरीजों की जानकारी अलग-अलग जगह बंटी रहने की वजह से अस्पतालों और मरीजों को पहले से कितना नुकसान हो रहा है।
मरीज के इलाज का पूरा सफर इस समस्या को साफ दिखाता है। वह पहले किसी स्थानीय डॉक्टर को दिखा सकती है, फिर किसी जांच केंद्र पर जांच करा सकती है, उसके बाद विशेषज्ञ डॉक्टर से सलाह ले सकती है और अंत में अस्पताल में भर्ती हो सकती है। इलाज के हर चरण में मरीज से जुड़ी नई जानकारी तैयार होती है, लेकिन यह जानकारी अक्सर डॉक्टर, क्लिनिक और जांच केंद्र के बीच आगे नहीं पहुंचती।
इसके बाद क्या होता है, यह हम सभी अच्छी तरह जानते हैं कि मरीज की पूरी मेडिकल हिस्ट्री उपलब्ध नहीं होती, वही जांच दोबारा करानी पड़ती है, इलाज में अनावश्यक देरी होती है और ऐसी जानकारी जुटाने में घंटों लग जाते हैं जो पहले से कहीं और मौजूद होती है।
लंबे समय तक डेटा को अस्पताल या संस्था की अपनी संपत्ति की तरह देखा गया, जिसे अपने पास रखा जाए। जबकि असल में यह ऐसी जानकारी है, जिसे मरीज के साथ आगे बढ़ना चाहिए। अलग-अलग कंपनियों के अलग-अलग प्रारूप और एक-दूसरे से मेल न खाने वाली डिजिटल व्यवस्थाओं ने इस समस्या को और बढ़ाया है। अब जानकारी को अलग-अलग जगह बंद रखने की कीमत इतनी बढ़ गई है कि इसका नुकसान मरीजों और अस्पतालों, दोनों को हो रहा है। इसी वजह से निजी अस्पतालों ने आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन यानी एबीडीएम को एक अलग नजरिए से देखना शुरू किया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी कहा है कि अलग-अलग डिजिटल स्वास्थ्य प्रणालियों के बीच जानकारी के आदान-प्रदान के लिए एक समान मानकों की जरूरत है। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि मरीज जहां भी इलाज कराए, उसकी जरूरी स्वास्थ्य जानकारी अगले डॉक्टर या अस्पताल के काम आ सके।
दुनिया के अलग-अलग देशों के अनुभव बताते हैं कि जब मरीज की स्वास्थ्य जानकारी एक जगह से दूसरी जगह आसानी से नहीं पहुंचती, तो मरीज को खराब अनुभव हो सकता है, एक ही जांच बार-बार हो सकती है और इलाज में देरी हो सकती है। इसके विपरीत, अलग-अलग स्वास्थ्य प्रणालियों के बीच बेहतर तालमेल से जांचों की दोहराव वाली जरूरत और अस्पताल में दोबारा भर्ती होने के मामलों में कमी देखी गई है।
प्रशासन के स्तर पर भी यही समस्या दिखाई देती है। एक अस्पताल कई बीमा कंपनियों और भुगतान करने वाली संस्थाओं के साथ काम करता है। इनमें से हर संस्था की अपनी डिजिटल व्यवस्था और अपने तरीके होते हैं। जब ये व्यवस्थाएं एक-दूसरे से ठीक से बात नहीं कर पातीं, तो बीमा दावों की प्रक्रिया बेवजह धीमी और महंगी हो जाती है। इसका सीधा असर अस्पताल की वित्तीय टीम और उसके पैसे के प्रवाह पर पड़ता है।
नेशनल हेल्थ क्लेम्स एक्सचेंज (एनएचसीएक्स) इसी समस्या को दूर करने की कोशिश करता है। यह बीमा दावों की प्रक्रिया को एक समान बनाने पर काम करता है। चाहे डॉक्टर के लिए जरूरी जांच रिपोर्ट हो या अस्पताल और बीमा कंपनी के बीच भेजा जाने वाला दावा, अगर स्वास्थ्य संबंधी जानकारी एक जगह से दूसरी जगह आसानी से नहीं पहुंच सकती, तो यह पूरी व्यवस्था की कमी है।
एनएचसीएक्स और आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन स्वास्थ्य क्षेत्र के अलग-अलग हिस्सों पर काम करते हैं, लेकिन दोनों के पीछे मूल सोच एक ही है-जानकारी सुरक्षित तरीके से, एक समान व्यवस्था के तहत और जरूरी सुरक्षा उपायों के साथ एक जगह से दूसरी जगह पहुंच सके।
लेकिन स्वास्थ्य क्षेत्र में डिजिटल व्यवस्था सिर्फ ऊपर से लागू नहीं की जा सकती। इसे डॉक्टरों, अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाएं देने वालों के साथ मिलकर तैयार करना होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी चेतावनी दी है कि अगर डिजिटल व्यवस्था अलग-अलग और केवल ऊपर से तय करके लागू की जाती है, तो इससे स्वास्थ्य व्यवस्था में बिखराव और स्वास्थ्य कर्मचारियों पर प्रशासनिक बोझ बढ़ सकता है। इसलिए अलग-अलग प्रणालियों को आपस में जोड़ना ही मुख्य लक्ष्य होना चाहिए।
भारत में यह बात खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां निजी स्वास्थ्य क्षेत्र बहुत विविध है। महानगर का एक बड़ा कॉरपोरेट अस्पताल और दूसरे या तीसरे स्तर के शहर का छोटा अस्पताल एक जैसी तकनीक, संसाधन या डिजिटल व्यवस्था लागू करने की क्षमता नहीं रखते।
छोटे अस्पताल में अलग से तकनीकी टीम भी नहीं हो सकती। अगर डिजिटल व्यवस्था सही तरीके से नहीं बनाई गई, तो उसे लागू करने का अतिरिक्त बोझ भी अस्पताल पर पड़ सकता है। इसलिए डिजिटल व्यवस्था को अपनाने की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि अस्पतालों को कितना व्यावहारिक सहयोग मिलता है और नई व्यवस्था मरीजों के इलाज के मौजूदा तरीके के साथ कितनी आसानी से जुड़ पाती है।
आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के दूत और एनएचसीएक्स के समर्थक के रूप में, एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स ऑफ इंडिया (एएचपीआई) राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण के साथ मिलकर काम कर रहा है। इसका उद्देश्य अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवा देने वालों को इन डिजिटल व्यवस्थाओं का व्यावहारिक लाभ समझाना, अलग-अलग तरह के अस्पतालों में इनके इस्तेमाल को बढ़ावा देना और अस्पतालों के अनुभवों को उन लोगों तक पहुंचाना है, जो इन डिजिटल व्यवस्थाओं को तैयार कर रहे हैं।
निजी स्वास्थ्य क्षेत्र सिर्फ भारत की डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था का इस्तेमाल करने वाला नहीं रह सकता। अस्पताल इस व्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण उपयोगकर्ताओं में हैं, इसलिए उन्हें इसे बनाने में भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवा देने वालों को जानकारी के अलग-अलग जगह बंटे होने और आपसी तालमेल की कमी का जो अनुभव होता है, उसे देश में डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था को आगे बढ़ाने की योजना में शामिल करना होगा।
आगे का काम चार हिस्सों में बांटा जा सकता है।पहला, अस्पतालों को ऐसी डेटा व्यवस्थाओं को खत्म करना होगा, जिनका अलग-अलग बंद पड़े रहना किसी के काम नहीं आता।
दूसरा, स्वास्थ्य तकनीक से जुड़ी कंपनियों को ऐसे उत्पाद और सॉफ्टवेयर बनाने होंगे, जो एक-दूसरे के साथ आसानी से काम कर सकें।तीसरा, चिकित्सा संस्थाओं और संगठनों को छोटे अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों को डिजिटल व्यवस्था अपनाने के शुरुआती चरण में मदद करनी होगी। चौथा, नीति बनाने वालों को ऐसे समान और व्यावहारिक मानक तय करने होंगे, जिन्हें स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े सभी लोग अपना सकें।
आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन की सफलता तब मानी जाएगी, जब अस्पतालों, डॉक्टरों और मरीजों को स्वास्थ्य व्यवस्था में बिखराव कम होता हुआ महसूस होगा। जब ऐसा होगा और ऐसा होना संभव है तब डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था को मरीजों के इलाज का अधिक बेहतर और प्रभावी तरीका माना जाएगा।
(लेखक एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स ऑफ इंडिया (एएचपीआई) के महानिदेशक हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत हैं।)

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