Why did it take 23 years to receive the honor? Supreme Court stern on the President's Gallantry Medal case.Why did it take 23 years to receive the honor? Supreme Court stern on the President's Gallantry Medal case.

अनिवार्य प्रश्न। संवाद।

नई दिल्ली। राष्ट्रपति वीरता पदक देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि जब हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा जा चुका है, तब उसका पालन करने में देरी क्यों की जा रही है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को 29 जुलाई तक का अंतिम समय देते हुए स्पष्ट कर दिया कि अब इस मामले में और समय नहीं दिया जाएगा। मामला मध्य प्रदेश के पूर्व पुलिस अधिकारी विवेक सिंह चौहान को राष्ट्रपति वीरता पदक दिए जाने से जुड़ा है, जो पिछले 23 वर्षों से इस सम्मान के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने गृह सचिव गोविंद मोहन की ओर से दायर आवेदन पर सुनवाई की। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के 25 मार्च के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की है। उनका कहना था कि यह किसी अधिकारी के खिलाफ नहीं, बल्कि सिद्धांत से जुड़ा मामला है। इस पर अदालत ने पूछा कि जब तक पुनर्विचार याचिका पर फैसला नहीं होता, तब तक आदेश का पालन क्यों नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि बाद में पुनर्विचार याचिका स्वीकार हो जाती है तो स्थिति उसके अनुसार देखी जा सकती है।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने केंद्र सरकार से पूछा कि आखिर आदेश का पालन करने में समस्या क्या है। अदालत ने कहा कि पहले आदेश का पालन कीजिए और फिर पुनर्विचार याचिका पर अपनी दलील रखिए। न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने भी सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि सरकार आदेश की अनदेखी करती है तो अदालत स्वयं 15 अगस्त को वीरता सम्मान देने पर विचार कर सकती है। हालांकि अदालत ने केंद्र सरकार को एक अंतिम अवसर देते हुए कहा कि सरकार 29 जुलाई तक अपना फैसला बता दे। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि अगली तारीख पर किसी तरह का अतिरिक्त समय नहीं दिया जाएगा। अदालत ने सॉलिसिटर जनरल से यह संदेश सरकार तक पहुंचाने को भी कहा कि अदालत सरकार के रवैये से संतुष्ट नहीं है।

यह मामला वर्ष 2003 का है। उस समय विवेक सिंह चौहान ग्वालियर जिले के घाटीगांव थाने में थाना प्रभारी थे। उन्हें सूचना मिली थी कि एक गांव में डकैत छिपे हुए हैं। इसके बाद उन्होंने पुलिस टीम के साथ अभियान चलाया। मुठभेड़ में दो डकैत मारे गए और इस कार्रवाई के दौरान चौहान खुद भी घायल हो गए। मजिस्ट्रेट जांच में उन्हें क्लीन चिट मिली। इसके बाद उन्हें आउट ऑफ टर्न प्रमोशन और राष्ट्रपति वीरता पदक देने की सिफारिश की गई। लंबे समय तक मामला लंबित रहने के बाद वर्ष 2018 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को उनका नाम केंद्र सरकार को भेजने का निर्देश दिया। राज्य सरकार ने 2019 में उनका नाम भेजा, लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उसी वर्ष प्रस्ताव को खारिज कर दिया। इसके बाद मामला फिर अदालत पहुंचा और कानूनी लड़ाई जारी रही।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने दिसंबर 2024 में केंद्र सरकार को एक महीने के भीतर विवेक सिंह चौहान को राष्ट्रपति वीरता पदक देने का निर्देश दिया था। आदेश का पालन नहीं होने पर अवमानना की कार्यवाही भी शुरू हुई। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि राष्ट्रपति ने चौहान को गैलेंट्री मेडल देने की मंजूरी दे दी है। हालांकि हाई कोर्ट ने कहा कि गैलेंट्री मेडल और राष्ट्रपति वीरता पदक दोनों अलग-अलग सम्मान हैं। अदालत के अनुसार राष्ट्रपति वीरता पदक अधिक प्रतिष्ठित सम्मान है, जबकि गैलेंट्री मेडल बड़ी संख्या में कर्मियों को दिया जाता है। इसी कारण हाई कोर्ट ने इसे अपने आदेश का पूर्ण पालन नहीं माना। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट कर दिया है कि जब अपील पहले ही खारिज हो चुकी है, तब आदेश का पालन किया जाना चाहिए। ऐसे में 29 जुलाई की अगली सुनवाई इस मामले में बेहद अहम मानी जा रही है।

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