Participatory Water Budgeting Will Transform the Face of Rural India—A Unique Blend of Policy and Technology for Water Security and Community Empowerment.Participatory Water Budgeting Will Transform the Face of Rural India—A Unique Blend of Policy and Technology for Water Security and Community Empowerment.

अनिवार्य प्रश्न। संवाद।

नई दिल्ली। बढ़ती मांग, असमान वितरण और जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितताओं के कारण ग्रामीण भारत में जल शासन (वॉटर गवर्नेंस) में सुधार करना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है. भारत अपनी आबादी और मवेशियों की विशाल संख्या के कारण जल संसाधनों पर भारी दबाव का सामना कर रहा है, जहां विश्व की 17.5 प्रतिशत जनसंख्या और 11.6 प्रतिशत मवेशी मौजूद हैं. विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध पानी का 80 से 90 प्रतिशत हिस्सा अकेले कृषि क्षेत्र में उपयोग किया जाता है. इस असीमित दोहन के कारण भूजल स्तर में लगातार गिरावट आ रही है और पानी के आवंटन को लेकर टकराव बढ़ रहे हैं. इन चुनौतियों से निपटने के लिए अब पारंपरिक आपूर्ति-आधारित दृष्टिकोण के बजाय ‘मांग-आधारित’ और योजनाबद्ध जल प्रबंधन प्रणालियों को अपनाया जा रहा है. इस दिशा में ‘जल बजटिंग’ एक परिवर्तनकारी साधन के रूप में उभरी है, जो गांव या जिला स्तर पर पानी की उपलब्धता और मांग का व्यवस्थित आकलन कर हर बूंद का हिसाब रखने और समुदायों को आत्मनिर्भर बनाने में मदद कर रही है.

सरकारी योजनाएं और जमीनी संस्थागत प्रयास केंद्र सरकार की ‘अटल भूजल योजना’ (2019) ग्राम पंचायत स्तर पर विकेंद्रीकृत जल शासन के तहत जल बजटिंग को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दे रही है. भूजल की भारी कमी वाले सात राज्यों के 229 ब्लॉकों में इसे प्रायोगिक आधार पर लागू किया गया, जिसके बेहतरीन परिणाम सामने आए हैं और 180 ब्लॉकों में भूजल स्तर में स्पष्ट सुधार देखा गया है. इस योजना के तहत मार्च 2026 तक पारंपरिक जल प्रणालियों जैसे बावड़ी, जोहड़, टांका और डिग्गी समेत लगभग 81,700 जल संरक्षण संरचनाओं का जीर्णोद्धार किया जा चुका है और ग्राम पंचायतों द्वारा 8,203 से अधिक वार्षिक जल बजट पूरे किए गए हैं. साथ ही, मांग-पक्ष प्रबंधन के तहत करीब 9 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ड्रिप-स्प्रिंकलर सिंचाई, मल्चिंग और फसल विविधीकरण जैसी उन्नत पद्धतियों को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया गया है. इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय जल मिशन के तहत ‘नारी शक्ति से जल शक्ति’ अभियान के जरिए महिला स्वयं सहायता समूहों और जल उपभोक्ता संघों को जोड़कर इसे एक जन-आंदोलन का रूप दिया जा रहा है.

विभिन्न राज्यों के सफल मॉडल और सामुदायिक भागीदारी जमीनी स्तर पर भागीदारी-आधारित जल प्रबंधन के कई प्रेरक उदाहरण सामने आए हैं:

  • हिवरे बाज़ार (महाराष्ट्र): 1970 के दशक से पानी की भारी कमी से जूझ रहे इस गांव ने ग्राम सभा स्तर पर ‘जल बजट’ को संस्थागत रूप दिया, जहां वार्षिक जल उपलब्धता के आधार पर ही फसल योजनाएं तय की जाती हैं और गहरे बोरवेल पर सख्त प्रतिबंध है. इस मॉडल से प्रेरित होकर महाराष्ट्र सरकार ने अपनी सूखा-रोधी रणनीति में जल बजटिंग को शामिल किया है, जिसका लक्ष्य हर साल 5,000 गांवों को जल-सुरक्षित बनाना है.
  • जलयुक्त शिवर अभियान (महाराष्ट्र): वर्ष 2014 में शुरू हुए इस अभियान ने मोबाइल एप्लीकेशन और जियोटैगिंग जैसी स्मार्ट तकनीकों के मेल से 11,000 से अधिक गांवों को सूखा-मुक्त घोषित करने में सफलता पाई है, जिससे भूजल स्तर में 1.5 से 2 मीटर की वृद्धि हुई है.
  • मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान (राजस्थान): वर्ष 2016 में “फोर वाटर्स कॉन्सेप्ट” (वर्षा जल, भूजल, भूमिगत जल और मिट्टी की नमी का संरक्षण) पर आधारित इस अभियान ने ग्राम सभा स्तर पर जल बजटिंग को संस्थागत रूप देकर भूजल स्तर में 4% की बढ़ोतरी की और करीब 41 लाख लोगों तथा 45 लाख पशुओं के लिए पानी की उपलब्धता में उल्लेखनीय सुधार किया.

स्मार्ट तकनीक का समावेशन: ‘वरुणी वेब एप्लीकेशन’ आधुनिक दौर में स्थानीय स्तर पर डेटा-आधारित सटीक योजना निर्माण को मजबूती देने के लिए ‘वरुणी वेब एप्लीकेशन’ का विकास किया गया है. भारत-जर्मन द्विपक्षीय परियोजना “ग्रामीण भारत में जल सुरक्षा और जलवायु अनुकूलन” (डब्ल्यूएएससीए) के तहत जल शक्ति मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय और नीति आयोग के तकनीकी सहयोग से इस एप्लीकेशन को तैयार किया गया है.

यह एक चक्र-आधारित पद्धति का उपयोग करने वाला वैज्ञानिक और बेहद सरल टूल है, जिसे आधिकारिक पोर्टल https://wasca.in/index के माध्यम से एक्सेस किया जा सकता है. यह वेब एप्लीकेशन आधिकारिक सरकारी पोर्टलों से वर्षा, भूमि उपयोग, फसल पैटर्न, जनसंख्या और उपलब्ध जल संसाधनों का डेटा स्वचालित (ऑटोमैटिक) रूप से प्राप्त करता है. इसके बाद इसके भीतर मौजूद कंप्यूटेशनल गणना प्रणाली के जरिए यह आपूर्ति और मांग का व्यवस्थित मिलान कर स्थानीय अधिकारियों को यह सटीक जानकारी देता है कि किसी ब्लॉक में पानी की अधिकता है या कमी. मानवीय भूलों से मुक्त यह स्वचालित प्रणाली स्थानीय स्तर पर सटीक जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और कुशल सिंचाई पद्धतियों को अपनाने के लिए सही निर्णय लेने में मदद कर रही है.

निष्कर्ष जल एक सीमित संसाधन है और जनसंख्या वृद्धि, कृषि संबंधी मांग तथा जलवायु परिवर्तन के कारण इस पर दबाव लगातार बढ़ रहा है. ऐसे में टुकड़ों में काम करने के बजाय नीति, सामूहिक जनभागीदारी और ‘वरुणी’ जैसे डिजिटल उपकरणों का यह अनूठा मेल जल-संकट वाले क्षेत्रों को आत्मनिर्भर बनाने में सक्षम है. दीर्घकालिक जल सुरक्षा, कृषि संवहनीयता और समावेशी आर्थिक विकास सुनिश्चित करने के लिए सभी स्तरों पर नियोजन प्रक्रियाओं में ‘जल बजटिंग’ को संस्थागत रूप देना अब अनिवार्य हो गया है.

Powered by Syahi Prakashan | Anivarya Prashna News & Web Group