अशोक कुमार द्विवेदी देश में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं होता बल्कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी संवैधानिक प्रक्रिया है। ऐसे में मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना केवल चुनाव आयोग का अधिकार ही नहीं, उसका संवैधानिक दायित्व भी है। इसी उद्देश्य से बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक रंग ले चुका है। सर्वोच्च न्यायालय में अपेक्षित राहत न मिलने के बाद विपक्षी दलों द्वारा मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखना कई नए प्रश्न खड़े करता है।सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही इस प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने से इंकार कर चुका है, तो फिर उसी विषय को राजनीतिक अभियान का रूप देने की आवश्यकता क्यों महसूस की जा रही है? क्या यह वास्तव में मतदाताओं के अधिकारों की लड़ाई है या फिर चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास? मतदाता सूची का पुनरीक्षण जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 तथा मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के अंतर्गत किया जाता है।भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी देता है। इसी जिम्मेदारी के तहत समय-समय पर मतदाता सूची का पुनरीक्षण किया जाता रहा है। यह कोई नई प्रक्रिया नहीं है। चुनाव आयोग दशकों से मृत, स्थानांतरित अथवा एक से अधिक स्थानों पर दर्ज मतदाताओं के नाम हटाने तथा पात्र नागरिकों के नाम जोड़ने का कार्य करता आया है। यदि मतदाता सूची की शुद्धता ही संदेह के घेरे में रहे तो निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा भी कमजोर पड़ जाएगी।ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि बिहार में शुरू हुई इस प्रक्रिया का विरोध धीरे-धीरे राजनीतिक आंदोलन में बदल गया । लेकिन अब तक विपक्ष ऐसा कोई व्यापक और प्रमाणित उदाहरण प्रस्तुत नहीं कर सका है जिससे यह सिद्ध हो कि बड़े पैमाने पर पात्र मतदाताओं के नाम मनमाने ढंग से हटाए जा रहे हैं। यदि कहीं किसी स्तर पर त्रुटि हुई भी है तो चुनाव आयोग ने उसके लिए दावा और आपत्ति की वैधानिक व्यवस्था उपलब्ध कराई है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पहले संस्थागत उपायों का उपयोग होना चाहिए न कि सीधे चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाया जाना चाहिए।और भी रोचक तथ्य यह है कि एसआईआर जैसी प्रक्रियाओं को लेकर विपक्ष की मुखरता सभी राज्यों में समान नहीं दिखती। असम और पश्चिम बंगाल में इसे लोकतंत्र पर हमला बताया जाता है जबकि अन्य राज्यों में अपेक्षाकृत कम विरोध दिखाई देता है। यदि यह वास्तव में लोकतांत्रिक सिद्धांतों का प्रश्न है तो विरोध का स्वर सभी राज्यों में समान होना चाहिए। चयनात्मक विरोध स्वाभाविक रूप से राजनीतिक मंशा पर प्रश्न खड़े करता है।पिछले कुछ वर्षों में विपक्ष की ओर से बार-बार ईवीएम, चुनाव आयोग, मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया पर संदेह व्यक्त किया जाता रहा है। किंतु जब चुनाव परिणाम उनके पक्ष में आते हैं, तब वही संस्थाएं स्वीकार्य हो जाती हैं। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, लेकिन बिना ठोस प्रमाण के संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर लगातार प्रश्न उठाना लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही कमजोर करता है।यह भी स्मरणीय है कि भारत में लगभग 100 करोड़ से अधिक पंजीकृत मतदाता हैं। इतनी विशाल चुनावी प्रक्रिया में त्रुटियों की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं की जा सकती । इसलिए पुनरीक्षण आवश्यक है। चुनाव आयोग का उद्देश्य किसी का मताधिकार छीनना नहीं है। बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम सूची में हो और अपात्र अथवा काल्पनिक नाम हटाए जाएं।लोकतंत्र की मजबूती इस बात में नहीं कि हर प्रशासनिक प्रक्रिया को राजनीतिक विवाद बना दिया जाए । बल्कि इस बात में है कि यदि कोई वास्तविक शिकायत हो तो उसका तथ्य और प्रमाण के आधार पर समाधान खोजा जाए। यदि विपक्ष के पास एसआईआर में व्यापक अनियमितताओं के ठोस साक्ष्य हैं तो उन्हें सार्वजनिक करना चाहिए और न्यायिक प्रक्रिया के समक्ष रखना चाहिए। लेकिन यदि पूरा अभियान केवल आशंकाओं और राजनीतिक नारों पर आधारित है, तो इससे सबसे अधिक नुकसान लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख को ही होगा।भारतीय लोकतंत्र की शक्ति चुनाव आयोग, न्यायपालिका व मतदाता पर समान विश्वास में निहित है। चुनावी प्रतिस्पर्धा जितनी तीखी हो, उतना ही आवश्यक है कि संवैधानिक संस्थाओं पर आरोप तथ्यों के आधार पर लगाए जाएं । न कि राजनीतिक सुविधा के अनुसार। लोकतंत्र की रक्षा संस्थाओं को कमजोर करके नहीं, बल्कि उन्हें निष्पक्ष और सशक्त बनाए रखकर ही की जा सकती है। Post navigation चमकते रिश्ते, बुझती मानवता : संबंधों में हिंसा घर करने लगे तो यह केवल अपराध नहीं, बल्कि नैतिक पतन का गंभीर संकेत है.. प्रधानमंत्री मोदी के भारत के 5एफ विज़न को बुनता टेक्स 2026