Sunset of compassion in Suryadaya Hospital

आलेख: सूर्याेदय हॉस्पिटल में संवेदना का सूर्यास्त


आलेख:


चिकित्सा व्यवस्था में व्याप्त अव्यवस्था, भ्रष्टाचार और परिलक्षित आम आदमी के शोषण को आधार बनाकर उसकी समीक्षा करते हूए अपात्रों के हाथों से छीनकर उसके नियमन की अनिवार्यता की वकालत कर रहें हैं वरिष्ठ लेखक पं0 “छतिश द्विवेदी कुण्ठित “


किताबों में पढ़ी गयी डॉक्टर चड्ढा की कहानी अभी भूली नहीं थी कि जीवन में भी कुछ डॉक्टर चड्ढाओं से मेरा मिलना हो गया। सरकारी और मीडिया के आंकड़े क्या कहते हैं यह सत्य अलग होगा, लेकिन मेरे जीवन का घटित सत्य अलग है। एक दिन एक रिश्तेदार का कुछ सहयोग की चाह में फोन आया। उनके परिजन बीमार थे। मैं अस्पताल पहुंचा। साफ-साफ प्रतीत हो रहा था कि मरीज अपनी बीमारी में जिन्दगी और मौत से जूझ रहा है। वह पंडित दीनदयाल हॉस्पिटल में मेडिकल वार्ड में भर्ती था।

पंडित दीनदयाल अस्पताल वाराणसी की स्थिति जो भर्ती हुए हैं एवं जो इलाज कराए हैं वह तो जान ही रहे होंगे, लेकिन जो नहीं जानते उनके लिए बताना जरुरी है। भर्ती हो जाने के पश्चात और पानी की बोतल लग जाने के पश्चात चिकित्सक अपनी मर्जी से आते हैं, कभी कभी नहीं भी आते हैं। सरकारी चिकित्सालय में संवेदना की खोज करना ही मेरे लिए गलत है, क्योंकि संपूर्ण सरकारी सिस्टम में कुछेक लोगों को छोड़कर संवेदना जैसी चीज किसी के पास है ही नहीं। उक्त मरीज की किसी को परवाह नहीं थी। किसी से कुछ गुजारिस करने पर अनमने उत्तर देते ऐसे जैसे उन्हें किसी की जिन्दगी की कोई परवाह पड़ी नही हैं।
मैंने अपने कुछ मित्रों से बात किया।उनसे पूछा कि कुछ अच्छे चिकित्सालय में इलाज करने के लिये कहाँ जायें। मुझे मेरे मित्रों द्वारा सुझाया गया कि मैं अपने मरीज को लेकर भोज़ुबीर स्थित ‘सूर्याेदय अस्पताल’ में भर्ती कर दूँ। जहां सामान्य से कुछ बेहतर व्यवस्था व इलाज मिल सकेगा।

मैंने अपने मित्रों के सुझाव को स्वीकार किया और अपने मरीज को पंडित दीनदयाल चिकित्सालय से निकालकर एक दिन दोपहर की ढलती बेला में सूर्याेदय अस्पताल में भर्ती करा दिया। प्रथमता भारती से पहले मिलने पर चिकित्सकों का व्यवहार अच्छा लगा और जैसा कि प्रतीत हुआ कि यहां मरीज ठीक हो जाएगा, लेकिन शाम ढलने लगी, और उम्मीद का अंधियार बढने लगा। जांच पर जांच होने लगी और जांच इतनी की गई की पूछिये, और दवाइयां इतनी लिखी गईं कि एक से डेढ़ दिन में मरीज के लगभग एक से डेढ लाख खर्च हो गये। संध्या काल में जब मैं एक चिकित्सक से पूछा कि आप सीबीसी जांच का 450 रुपए से ज्यादा ले रहे हैं जबकि बाहर में यह मात्र 160 रुपए की होती है तो उसके अटेंडेंट का जवाब था कि यहां यही लगता है।
यहां उल्लेखनीय यह है कि सभी अस्पताल वाले अपना खुद का लैब भी खेले हुए हैं। यह सिर्फ सूर्याेदय हॉस्पिटल की बात नहीं है, बनारस ही नहीं देख भर में लगभग सभी चिकित्सालय अपना खुद का लैब या तो अस्पताल परिसर में या बाहरी परिसर में चलते हैं और उसमें जांच की मनमानी फीस वसूलते हैं। और सरकारी सिस्टम तो जो है सो है। अन्धा बना हुआ। जांच व दवाइयों के मूल्य में कभी कोई सरकारी एकीकरण नहीं किया गया है।

अब आप अपेक्षा करें कि एक अस्पताल जो बाहर होने वाली 160 रुपए की जांच के लिए 460 रुपए से अधिक लेता है तो उसके प्रबंधन में कितनी संवेदना बची हुई होगी समझा जा सकता है। मैं अन्य चिकित्सक साथियों से संवाद किया और चर्चा किया तो मालूम हुआ कि हर जांच जरूरी नहीं थी और हर जांच पर अधिक पैसा लिया गया था। ऐसा ही दवाइयां के लिखने में भी हुआ था।
कुछ जरुरी व गैरजरूरी चलाई गईं। रुपए की जैसे नदी बहा दी गयी। हालांकि डॉक्टर ‘‘मैं कोशिश कर रहा हूँ, मैं कोशिश कर रहा हूँ’’ ही कह पाए। इससे अधिक खाने के लिए उनके पास कोई ज्ञान का उचित आश्वासन नहीं था।
दूसरे दिन रात में उनके अटेंडेंट ने कई बार बताया कि मरीज अपनी स्थिति में सुधार नहीं कर रहा, वेंटिलेटर तक लगा दिया गया है। उसके बाद भी मरीज की स्थिति स्थिर है लेकिन अच्छी नहीं हुई बल्कि कह सकते हैं की स्थिति गिर रही है।
हम संबंधीजनों के आपस में बात करने पर यह प्रतीत हुआ कि यह लोग मरीज को संभाल नहीं पा रहे इसलिए अपनी जिम्मेदारी से छुटकारा पाने के लिए बार-बार मरीज की दशा पर इशारा कर रहे हैं। अब इनके पास रखना सुरक्षित नहीं है। अतः विचार विमर्श के बाद हम सब लोग अपने मरीज को लेकर मैक्सवेल हॉस्पिटल चले गए।

जहां कुछ नई विसंगतियां भी दिखाई दीं। वहां के चिकित्सकों ने बताया कि वेंटिलेटर पर रखने से पहले मरीज को कुछ स्ट्रगल करने दिया जाता है। वेंटिलेटर पर रखने के बाद मरीज को बचाना मुश्किल हो जाता है। दो जगह के चिकित्सकों ने दो तरह की बातें कीं। अंततः कई लाख रुपया व्यय करने के बाद परिणाम वही हुआ, न धन रहा, न जीवन रहा।

इसी दरमियान सूर्याेदय चिकित्सालय में मेरी बातचीत के समय वहां के प्रबंधक चिकित्सक ने कहा कि आप हिंदी में लम्बा मेमोरेंडम मत कहिये, हम अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। मुझे यह बात इसलिए याद है क्योंकि मुझे इस बात की काफी पीड़ा हुई कि वह चिकित्सक जब आम आदमी की भाषा नहीं जानता, जिसे हिंदी कहते हैं वह आम आदमी की संवेदना कैसे जानेगा। आज अलग-अलग विद्यालयों में पैसा फेंक कर पढ़ने वाले और पढ़कर अपना चिकित्सालय खोलने वाले चिकित्सक तनिक भी यह जान नहीं पाते कि बीमार अपनी आंखों में आंसू क्यों लिए होता है और अपने चिकित्सक में ईश्वर का आशीष क्यों देखना चाहता है। वह चिकित्सकों पर विश्वास करके लुट जाता है।

मैं इस बात को समझ रहा हूं कि किसी चिकित्सालय या व्यवस्था के प्रबंधन में एक सीमा तक व्यय करना होता है लेकिन इस व्यय करने के और प्रबंधन के ऊपर पड़ने वाले बोझ का बहाना लेकर कोई प्रबंधक 100 रुपये की जांच को 500 में करता है तो यह निश्चित है कि वह अत्याचार करता है।

पूरा देश किसी तरह के गैरजिम्मेदार, संवेदनाहीन व पशुप्राय जीवन धारण किए हुए चिकित्सकों की गिरफ्त में आ गया है। सरकारी सेवाओं में सम्मिलित चिकित्सक तो चिकित्सक रहे ही नहीं, पत्थर हुए हैं। लेकिन जो निजी क्षेत्र में समाज सुधार के अभियान को चला रहे हैं वह भी दीमक की तरह समाज को चाट रहे हैं।

आज चिकित्सा क्षेत्र में मची लूटपाट के कारण समाज में संवेदना मर रही है। पारस्परिक विश्वास का ह्रास हो रहा है। लोग प्राइवेट चिकित्सालय में सरकारी चिकित्सालयों की गैर जिम्मेदारी से बचने के लिए लिए जाते हैं। और वहां से पछताते हुए लौटते हैं। आखिर वे करें भी क्या? उनके पास कोई विकल्प नहीं है। भ्रष्ट सरकारों का तंत्र उनके काम नहीं आ रहा और समाज के भ्रष्ट अगुवा और व्यवस्थापक उनका शोषण कर रहे हैं।

जो चिकित्सक आम आदमी की भाषा नहीं जानते, उसकी संवेदना की पुकार नहीं सुन सकते,
भाषा मनुष्य को मनुष्य बनाती है। डॉक्टर को लोग भगवान थे समझते थे, संवेदना मनुष्य को भगवान बन सकती है। लेकिन अब पशुता से आगे बढ़कर वे खून चूसने वाले अत्याचारी हो गए हैं। इस नाते उन्हें राक्षस कहना समझना आम आदमी का कोई जुर्म नहीं है, या कोई अपराध नहीं है। बल्कि अब वह ऐसे ही हो गए हैं।

मैं उन चिकित्सकों की खोज कर रहा हूँ जिनमें शुद्ध संवेदना और उसकी भावना की इज्जत बची है, अन्यथा मेरी भी दृष्टि में हर चिकित्सक का स्थान स्खलित हुआ है। अपनी काशी में ही सूर्याेदय अस्पताल में संवेदना का सूर्यास्त होते हुए मैंने देखा है। सरकार और समाज को अपने स्वास्थ्य की देखभाल करने वाली इस चिकित्सकीय व्यवस्था को एक बार समीक्षा कर पुर्ण परिवर्तित करने की जरूरत है। यह व्यवस्था अभी पूरी तरह चोरों और बेईमानों के हाथों में है। चाहिये कि इनमें घुस आये अपात्रों को बाहर निकालें। इसमें केवल उस व्यक्ति को सेवा का अवसर मिलना चाहिए जिसके पास करुणा तथा संवेदना कूट-कूट कर भारी हो। जो संवेदनहीन लोग हैं उन्हें जीवन व मानवता की रक्षा के इस पूनीत कार्य चिकित्सा से पूरी तरह निस्कासित किया जाना चाहिए। ठीक वैसे ही जैसे पशुओं को बाड़े में रखा जाता है, घर के आंगन में नहीं।