अनिवार्य प्रश्न । संवाद। एक नया दौर: ग्लोबल स्पेस हब के रूप में उभरता भारत भारत सरकार के दूरदर्शी सुधारों और अनुकूल नीतियों के चलते देश का अंतरिक्ष क्षेत्र एक ऐतिहासिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। वर्ष 2014 में जहाँ देश में केवल एक स्पेस स्टार्टअप था, वहीं सरकार के निरंतर सहयोग से वर्ष 2026 तक भारत 400 से अधिक स्पेस स्टार्टअप्स का घर बन चुका है। इंडियन स्पेस पॉलिसी 2023 ने पूरी स्पेस वैल्यू चेन को निजी भागीदारी के लिए खोल दिया है, जिससे उपग्रह निर्माण, प्रक्षेपण सेवाओं और अंतरिक्ष अनुप्रयोगों में अभूतपूर्व नवाचार और निवेश को गति मिली है। वर्तमान में लगभग 8.4 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य वाली भारतीय अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के वर्ष 2030 तक 40-45 अरब डॉलर और वर्ष 2040 तक 100 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य है, जो भारत को वैश्विक वाणिज्यिक अंतरिक्ष गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनाने की ओर अग्रसर कर रहा है। मिशन आगमन: भारत के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ की तैयारी इस बदलते परिदृश्य के बीच, स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित ‘विक्रम-1’ का प्रक्षेपण भारत के अंतरिक्ष इतिहास में एक नया मील का पत्थर साबित होने जा रहा है। ‘मिशन आगमन’ के तहत 12 जुलाई से 4 अगस्त, 2026 के बीच निर्धारित यह प्रक्षेपण भारत का पहला निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल मिशन है। पूरी तरह से कार्बन कम्पोजिट स्ट्रक्चर, भरोसेमंद सॉलिड-फ्यूल बूस्टर और 3डी-प्रिंटेड लिक्विड इंजन से निर्मित यह रॉकेट 350 किलोग्राम तक के पेलोड को पृथ्वी की निचली कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) में 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित करने में सक्षम है। इस मिशन के तहत कई महत्वपूर्ण ग्राहक पेलोड भेजे जा रहे हैं, जिनमें अंतरिक्ष के मलबे को पकड़ने वाली रोबोटिक भुजा ‘एम्ब्रेस’ और तीन अन्य उपग्रह शामिल हैं। साथ ही, भारत के महान वैज्ञानिक सी. वी. रमन, विक्रम साराभाई और डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम को अनूठी श्रद्धांजलि देने के लिए चावल के दाने से भी छोटी आकृतियों वाला 18 कैरेट सोने का एक सूक्ष्म रॉकेट और ‘कॉस्मिक ब्लूम’ नामक कलाकृति भी इस उड़ान का हिस्सा बनेगी। नीतिगत सुधार और इन-स्पेस की सिंगल-विंडो भूमिका भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 के लागू होने के बाद, भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (इन-स्पेस) को एक स्वतंत्र एकल-खिड़की (सिंगल-विंडो) नियामक के रूप में और अधिक सशक्त बनाया गया है। इन-स्पेस ने जून 2026 तक 4,500 से अधिक संस्थाओं का पंजीकरण किया, 133 अनुमतियां जारी कीं और 106 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके प्रभावी प्रयासों से वर्ष 2025 के दौरान भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप्स में 15 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश आकर्षित हुआ। तकनीकी क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए संस्थान ने जून 2026 तक 118 प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौतों को सुगम बनाया है, जिससे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की विश्वस्तरीय सुविधाओं और तकनीकी विशेषज्ञता तक निजी क्षेत्र की पारदर्शी पहुंच सुनिश्चित हुई है। वित्तीय प्रोत्साहन: स्टार्टअप्स और स्वदेशी तकनीक को मजबूत सहारा निजी निवेश और नवाचार को गति देने के लिए सरकार ने तीन प्रमुख वित्तीय योजनाओं के माध्यम से एक मजबूत ढांचा तैयार किया है। पहली, ‘इन-स्पेस सीड फंड योजना’ के तहत कृषि, आपदा प्रबंधन और शहरी विकास से जुड़े समाधान विकसित करने वाले शुरुआती चरण के स्टार्टअप्स को 1 करोड़ रुपये तक का अनुदान और मेंटरशिप दी जा रही है। दूसरी बड़ी पहल, 1,000 करोड़ रुपये का वेंचर कैपिटल (वीसी) कोष है, जो वित्त वर्ष 2025-26 से 2029-30 तक पांच वर्षों में चरणबद्ध तरीके से (प्रतिवर्ष 100 करोड़ से 250 करोड़ रुपये) निवेश कर घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देगा। इसके अलावा, 500 करोड़ रुपये का ‘प्रौद्योगिकी अंगीकरण कोष’ (TAF) शुरू किया गया है, जो प्रारंभिक चरण की स्वदेशी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों को व्यावसायिक उत्पादों में बदलने के लिए स्टार्टअप्स और MSME को परियोजना लागत का 60% तक (अधिकतम 25 करोड़ रुपये) की वित्तीय सहायता प्रदान करता है। व्यवसायीकरण की रफ़्तार और उदार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) नीति इसरो की वाणिज्यिक शाखा ‘न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड’ (NSIL) ने पिछले कुछ वर्षों में अपने राजस्व में दस गुना वृद्धि दर्ज की है। जुलाई 2026 तक NSIL ने कुल 141 उपग्रहों (138 अंतरराष्ट्रीय और 3 भारतीय) का सफल प्रक्षेपण कर वैश्विक बाजार में भारत की साख मजबूत की है। इस वाणिज्यिक गति को और रफ्तार देने के लिए सरकार ने एक अत्यंत उदार और निवेशक-अनुकूल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) नीति लागू की है। इसके तहत उपग्रहों के निर्माण व संचालन, सैटेलाइट डेटा उत्पादों और ग्राउंड सेगमेंट में 74% तक स्वचालित मार्ग से निवेश की अनुमति है, जबकि इसके आगे सरकारी मार्ग लागू होता है। वहीं, उपग्रहों के पुर्जों और उप-प्रणालियों के निर्माण में 100% तक स्वचालित एफडीआई की अनुमति दी गई है, जबकि लॉन्च व्हीकल और स्पेसपोर्ट के निर्माण में 49% तक निवेश स्वचालित मार्ग से किया जा सकता है। नीति से प्रगति: जमीन पर दिखते ऐतिहासिक परिणाम इन सभी सुधारों के व्यावहारिक परिणाम पिछले कुछ वर्षों में स्पष्ट रूप से देखने को मिले हैं। अक्टूबर 2022 में NSIL ने वनवेब के 36 उपग्रहों को LVM-3 मिशन के जरिए कक्षा में स्थापित कर पहला समर्पित वाणिज्यिक मिशन पूरा किया। नवंबर 2022 में ‘मिशन प्रारंभ’ के तहत देश का पहला निजी रॉकेट ‘विक्रम-एस’ सफलतापूर्वक लॉन्च हुआ। इसके बाद मई 2024 में अग्निकुल कॉसमॉस ने भारत के पहले निजी प्रक्षेपण परिसर ‘धनुष’ से दुनिया के पहले सिंगल-पीस 3डी-प्रिंटेड सेमी-क्रायोजेनिक इंजन वाले रॉकेट का सफल प्रदर्शन किया। हाल ही में, फरवरी 2026 में इन-स्पेस के सहयोग से 511 करोड़ रुपये की लागत पर लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान (SSLV) की तकनीक हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को 10 वर्षों के लिए हस्तांतरित की गई। साथ ही, पिक्सेल के नेतृत्व में ध्रुव स्पेस और अन्य साझेदारों के साथ मिलकर पृथ्वी अवलोकन उपग्रह समूह के विकास के लिए पहली बड़ी सार्वजनिक-निजी भागीदारी को भी मंजूरी दी गई है। आत्मनिर्भरता और भविष्य का अंतरिक्ष नेतृत्व नीतिगत समर्थन, वित्तीय प्रोत्साहन और सार्वजनिक-निजी भागीदारी के इस मजबूत त्रिकोण ने भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र को आत्मनिर्भरता के एक नए युग में प्रवेश करा दिया है। इसरो के मार्गदर्शन में शुरू हुई यह यात्रा अब एक प्रतिस्पर्धी और गतिशील व्यावसायिक पारिस्थितिकी तंत्र का रूप ले चुकी है। आगामी विक्रम-1 का प्रक्षेपण न केवल तकनीकी आत्मनिर्भरता का प्रदर्शन है, बल्कि यह इस बात का भी प्रमाण है कि भारत वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करने और दुनिया के लिए सबसे भरोसेमंद एवं किफायती स्पेस पार्टनर बनने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। Post navigation मुंगेर: श्रीकृष्ण सेतु एप्रोच पथ के पुल के गाइडवाल में दरार, जांच शुरू