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Big shock to the film world Actor and filmmaker Shri Manoj Kumar passes away

फिल्मी दुनिया को बड़ा झटका: अभिनेता और फिल्मकार श्री मनोज कुमार का निधन


अनिार्य प्रश्न संवाद।


नई दिल्ली। 4 अप्रैल 2025 । हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता, निर्देशक और पटकथा लेखक श्री मनोज कुमार का 86 वर्ष की आयु में निधन हो गया। देशभक्ति आधारित फिल्मों के लिए प्रसिद्ध इस महान कलाकार ने मुंबई स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। वे पिछले कुछ समय से उम्र से जुड़ी बीमारियों से पीड़ित थे।
उनके निधन की खबर से फिल्म इंडस्ट्री, राजनीतिक जगत और उनके करोड़ों प्रशंसकों के बीच शोक की लहर दौड़ गई है। प्रधानमंत्री से लेकर बॉलीवुड के बड़े सितारों तक ने सोशल मीडिया पर उन्हें श्रद्धांजलि दी और उनके योगदान को अविस्मरणीय बताया।
मनोज कुमार का असली नाम हरिकिशन गिरि गोस्वामी था। उनका जन्म 24 जुलाई 1937 को अब पाकिस्तान के एबटाबाद में हुआ था। बंटवारे के दौरान उनका परिवार भारत आ गया और उन्होंने दिल्ली में शिक्षा प्राप्त की। मनोज कुमार बचपन से ही फिल्मों के प्रति आकर्षित थे और दिलीप कुमार से प्रभावित होकर उन्होंने अपना फिल्मी नाम ‘मनोज कुमार’ रखा।
उनकी पहचान एक ऐसे अभिनेता के रूप में बनी जो न सिर्फ रोमांटिक हीरो थे, बल्कि उन्होंने देशभक्ति को सिनेमा के परदे पर एक नई ऊँचाई दी। उन्हें ‘भारत कुमार’ की उपाधि दी गई क्योंकि उन्होंने कई फिल्मों में भारत माता के सच्चे सपूत की भूमिका निभाई।

फिल्मी सफर: अभिनय से निर्देशन तक
मनोज कुमार का फिल्मी सफर 1957 में आई फिल्म “फैशन” से शुरू हुआ, लेकिन उन्हें पहचान मिली 1964 में रिलीज़ हुई फिल्म “वो कौन थी?” से। इसके बाद उन्होंने “हरियाली और रास्ता”, “हिमालय की गोद में”, “शहीद” जैसी फिल्मों में अपनी अदाकारी से दर्शकों का दिल जीत लिया।
परंतु असली मील का पत्थर बनी 1967 की फिल्म “उपकार”, जिसे उन्होंने लिखा, निर्देशित और अभिनीत किया। यह फिल्म तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नारे “जय जवान, जय किसान” से प्रेरित थी। इस फिल्म में एक किसान और सैनिक के रूप में उनकी भूमिका ने उन्हें अमर कर दिया। “उपकार” के बाद उन्होंने “पूरब और पश्चिम”, “रोटी कपड़ा और मकान”, “क्रांति” जैसी कई सुपरहिट फिल्मों का निर्देशन और अभिनय किया। इन फिल्मों में न केवल मनोरंजन था, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय सरोकार भी थे। उनके सिनेमा ने एक पूरे युग को प्रभावित किया।
मनोज कुमार को उनके अतुलनीय योगदान के लिए कई पुरस्कारों से नवाजा गया। उन्हें पद्म श्री (1992) और दादा साहेब फाल्के पुरस्कार (2016) जैसे प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए। इसके अलावा उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, और कई राज्य स्तरीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया। उनकी फिल्में न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर सफल रहीं बल्कि आलोचकों ने भी उन्हें सराहा। उनके द्वारा निर्देशित फिल्म “उपकार” को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
मनोज कुमार का निजी जीवन हमेशा बेहद सादा और विवादों से दूर रहा। वे एक पारिवारिक व्यक्ति थे और उन्होंने फिल्मों के बाहर बहुत कम सार्वजनिक उपस्थिति दी। उनकी पत्नी शशि गोस्वामी और दो बेटे हैं। बड़े बेटे कुणाल गोस्वामी ने भी कुछ फिल्मों में अभिनय किया, लेकिन वह अपने पिता जैसी सफलता नहीं पा सके। मनोज कुमार ने जब सिनेमा से दूरी बनाई, तब भी वे सामाजिक मुद्दों और देशभक्ति से जुड़े विषयों पर लेखन और सामाजिक कार्यों में लगे रहे।

अंतिम विदाई
मनोज कुमार का अंतिम संस्कार आज शाम मुंबई के विले पार्ले श्मशान घाट में पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा। अंतिम दर्शन के लिए उनके आवास पर सुबह से ही बॉलीवुड के कई दिग्गज, राजनेता और प्रशंसक पहुंचे। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, अनुपम खेर, अक्षय कुमार, सुभाष घई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई लोगों ने शोक संवेदनाएं प्रकट कीं।
प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट कर कहा, “मनोज कुमार जी सिर्फ एक महान कलाकार नहीं थे, बल्कि वे भारत माता के सच्चे भक्त थे। उनके फिल्मी किरदारों ने देशभक्ति को जन-जन तक पहुँचाया। उनका जाना एक युग का अंत है।”
मनोज कुमार की फिल्में आज भी टीवी और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खूब देखी जाती हैं। विशेषकर स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर उनकी फिल्में आज भी प्रासंगिक लगती हैं।
उनकी प्रमुख फिल्मों में शामिल हैं: शहीद (1965), उपकार (1967), पूरब और पश्चिम (1970), रोटी कपड़ा और मकान (1974), क्रांति (1981), इन फिल्मों के संवाद, गीत और संदेश आज भी लोगों की स्मृतियों में जीवित हैं।
मनोज कुमार की पहचान सिर्फ एक अभिनेता या निर्देशक तक सीमित नहीं थी। वे एक विचार थे, एक सोच जो सिनेमा के माध्यम से देश को जागरूक करना चाहता था। उन्होंने बार-बार साबित किया कि सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का माध्यम भी हो सकता है।
उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहेगा। आज जब सिनेमा में विषयों की विविधता बढ़ी है, मनोज कुमार की तरह एक समर्पित देशभक्त फिल्मकार की कमी महसूस की जाती है।
मनोज कुमार का जाना केवल एक कलाकार का अंत नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के एक स्वर्णिम अध्याय का पटाक्षेप है। उनके द्वारा रचा गया देशभक्तिपूर्ण सिनेमाई संसार हमेशा जीवित रहेगा। उन्होंने जो प्रेरणा, संस्कार और विचार अपनी फिल्मों के माध्यम से दिए, वे अमर हैं।
उनकी विरासत को शब्दों में बांध पाना कठिन है। पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जब भी भारतीय सिनेमा में देशभक्ति की बात होगी, तो ‘भारत कुमार’ — मनोज कुमार का नाम सबसे पहले लिया जाएगा।
भावभीनी श्रद्धांजलि।